भोपाल | विशेष रिपोर्ट

डॉ. महेश प्रसाद मिश्रा, भोपाल

इतिहास गवाह है—घमंड का अंत तय होता है। रावण का अहंकार टूटा था, और सत्ता का अहंकार भी एक दिन टूटता है। आज मध्यप्रदेश में यही चेतावनी हवा में तैर रही है। सत्ता के शिखर पर बैठी सरकार ऐसी आत्ममुग्ध प्रतीत होती है कि उसे न सही दिख रहा है, न गलत। यही वह स्थिति है जहाँ लोकतंत्र सबसे अधिक खतरे में पड़ता है।

इंदौर जैसे बड़े शहर में जहरीला पानी पीने से लोगों की मौतें होना केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि संवेदनहीन शासन का प्रमाण है। इसके विपरीत, एक तथाकथित अति वरिष्ठ नेता की सार्वजनिक भाषा ऐसी है कि सामान्य नागरिक भी शर्म से सिर झुका ले—पर सत्ता को कोई फर्क नहीं पड़ता। यह दोहरा मापदंड नहीं तो और क्या है?

प्रदेश का शीर्ष नेतृत्व मानो सत्ता के नशे में इतना डूबा है कि न्याय का तराजू हाथ से छूट गया है। जब पूरे प्रदेश में अराजक तत्वों द्वारा मनुस्मृति जलाने जैसी घटनाएँ हुईं, तब शासन-प्रशासन मूकदर्शक बना रहा; आज तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं। परंतु जब प्रतिक्रिया में आंबेडकर की तस्वीर जलाने की घटना हुई, तो तत्क्षण एफआईआर दर्ज कर सात लोगों को जेल भेज दिया गया। यही वह पक्षपात है जिसे जनता कुंठित मानसिकता के रूप में देख रही है।

सत्ता को यह समझना होगा कि अराजक तत्वों को संरक्षण देकर लोकतंत्र सुरक्षित नहीं होता। इतिहास बार-बार बताता है—जो शक्तियाँ अनुशासन तोड़ती हैं, वे अंततः व्यवस्था को ही नुकसान पहुँचाती हैं। यह चेतावनी है, धमकी नहीं; सबक है, आरोप नहीं।

आज मध्यप्रदेश में अराजकता का आलम यह है कि हत्या, बलात्कार, चोरी, लूट और डकैती सामान्य समाचार बन चुके हैं। रिश्वतखोरी चरम पर है। अधिकारी बेलगाम होकर जनता को निचोड़ रहे हैं, और शासन की चुप्पी सवालों के घेरे में है। विडंबना यह कि जब आम नागरिक इन कुरीतियों के विरुद्ध आवाज उठाता है, तो उसे दबाने के प्रयास तेज हो जाते हैं।

एक और कड़वी सच्चाई सत्ता को आत्ममंथन के लिए मजबूर करनी चाहिए। वर्षों तक जिन पर जातिवाद का आरोप लगाया गया, आज वही आरोप सत्ता के व्यवहार में झलकते हैं। सत्ता तक पहुँचने में समाज के सभी वर्गों का योगदान रहा है, परंतु एक वर्ग विशेष—जो लंबे समय से एकतरफा समर्थन देता आया—आज स्वयं को उपेक्षित और शोषित महसूस कर रहा है। यह भावना किसी दल के खिलाफ नहीं, बल्कि अन्याय के खिलाफ है।

सत्ता स्थायी नहीं होती, जनविश्वास होता है। यदि जनविश्वास टूटता है, तो सत्ता का पतन तय है। आज आवश्यकता है आत्मावलोकन की—कठोर आलोचना से नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण सुधार से। लोकतंत्र में चेतावनी को शत्रुता नहीं, अवसर समझा जाना चाहिए।

समय रहते आँखें खोलना ही समझदारी है।

 

Visited 20 times, 1 visit(s) today
Share.
Leave A Reply

Uploading your documents

Please do not close or refresh this window.
This may take a few seconds.

Exit mobile version