✍️ डॉ. महेश प्रसाद मिश्रा, भोपाल की कलम से

विशेष रिपोर्ट | वैचारिक विश्लेषण

सत्ता के संरक्षण में पनपता अपराध और कराहता लोकतंत्र**

यदि किसी आम नागरिक पर गंभीर आरोप लग जाएँ या उसे जेल जाना पड़े, तो वह चपरासी की नौकरी के लिए भी अयोग्य हो जाता है। लेकिन यही देश की सबसे बड़ी विडंबना है कि जिन पर हत्या, अपहरण, लूट, माफिया गतिविधियों जैसे संगीन आरोप हैं, वे खुलेआम सांसद, विधायक और मंत्री बनकर सत्ता का सुख भोगते हैं। सवाल उठता है—ऐसे में इस देश और लोकतंत्र का भला कैसे संभव है?

बिहार की राजनीति में लंबे समय तक भय और आतंक का पर्याय बना रहा एक नाम—पप्पू यादव। 1967 में मधेपुरा जिले में जन्मे पप्पू यादव 1990 में निर्दलीय विधायक बनकर राजनीति में आए। सीमांचल क्षेत्र में उनका इतना खौफ बताया जाता है कि लोग कभी उनका नाम लेने से भी डरते थे। हत्या, किडनैपिंग, मारपीट, बूथ कैप्चरिंग और आर्म्स एक्ट जैसे मामलों के आरोप विभिन्न थानों में दर्ज बताए जाते हैं।

सबसे चर्चित मामला एमसीपी विधायक अजीत सरकार की हत्या का रहा, जिसमें पप्पू यादव को लगभग 17 वर्ष जेल में रहना पड़ा। 14 जून 1998 की शाम पूर्णिया शहर में अजीत सरकार पर ताबड़तोड़ फायरिंग की गई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में 100 से अधिक गोलियां लगने की बात सामने आई। इस हत्याकांड के बाद उनके पुत्र अमित सरकार ने जान का खतरा बताते हुए देश छोड़कर ऑस्ट्रिया में शरण ली। यह घटना बिहार की कानून-व्यवस्था पर एक काला धब्बा बन गई।

राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाइयों में भी सीमांचल कई बार लहूलुहान हुआ। पप्पू यादव और आनंद मोहन के बीच दबदबे की जंग, भांगड़ा जैसी घटनाएँ, और जाति आधारित वोट की राजनीति—इन सबने क्षेत्र को लंबे समय तक हिंसा और भय में झोंक दिया। एक ओर यादव समाज को एकजुट करने की राजनीति, दूसरी ओर अगड़ी जातियों का नेतृत्व—इन टकरावों की कीमत आम जनता ने चुकाई।

आरोपों की फेहरिस्त यहीं नहीं रुकती। एक घटना में फ्लाइट के दौरान एयरहोस्टेस को सुरक्षा नियमों के पालन के लिए कहने पर धमकी देने का आरोप भी लगा। ऐसी अनेक घटनाएँ हैं जो राष्ट्रीय मीडिया में कभी सामने नहीं आतीं, लेकिन स्थानीय लोग आज भी उन्हें दबी ज़ुबान में याद करते हैं।

हालाँकि यह सच्चाई केवल बिहार तक सीमित नहीं है। आज देश की लगभग सभी राजनीतिक पार्टियों में 75–80 प्रतिशत तक ऐसे नेता बताए जाते हैं, जिन पर गंभीर आपराधिक मामले चल रहे हैं। लेकिन वे “माननीय सांसद” या “माननीय विधायक” बनकर सत्ता का संरक्षण पाए हुए हैं।

हाल ही में मध्य प्रदेश का उदाहरण सामने आया, जहाँ एक प्रभावशाली महिला मंत्री के करीबी रिश्तेदार—जीजा और भाई—कुख्यात तस्करी के मामलों में जेल तक पहुँच चुके हैं, फिर भी सत्ता के गलियारों में सब कुछ “सामान्य” दिखता है। यही इस देश की सबसे बड़ी विडंबना है—अपराधी बदनाम नहीं, बल्कि ताकतवर हो जाता है।

जब अपराध राजनीति की योग्यता बन जाए और कानून सिर्फ आम आदमी के लिए रह जाए, तब लोकतंत्र खोखला हो जाता है। आज सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या देश का भविष्य अपराध और सत्ता के इस गठजोड़ के भरोसे सुरक्षित है?

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