बरगी डैम क्रूज हादसा: सिस्टम की ‘क्रूरता’ पर भारी पड़ी मां की ‘ममता’, पर क्या सोती सरकार जागेगी?
— डॉ. महेश प्रसाद मिश्रा, भोपाल
जबलपुर/भोपाल: मध्यप्रदेश के जबलपुर स्थित बरगी डैम में हुआ क्रूज हादसा महज एक ‘दैवीय आपदा’ नहीं, बल्कि प्रशासन की संवेदनहीनता और घोर लापरवाही का वह काला अध्याय है, जिसने कई हंसते-खेलते परिवारों को हमेशा के लिए उजाड़ दिया। जब मौसम विभाग की स्पष्ट चेतावनी के बावजूद नीली लहरों पर मौत का सफर शुरू हुआ, तो सवाल सीधे व्यवस्था के उन ‘नुमाइंदों’ पर उठते हैं जो फाइलों में तो फिट हैं, लेकिन इंसानियत के पैमाने पर पूरी तरह फेल हो चुके हैं।
सबसे बड़ा सवाल—जब चेतावनी थी, तो अनुमति क्यों? मौसम विभाग द्वारा खराब मौसम की स्पष्ट चेतावनी जारी की गई थी। इसके बावजूद डैम के भीतर क्रूज संचालन की अनुमति कैसे दी गई?
- क्या सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन किया गया?
- क्या यात्रियों को पर्याप्त लाइफ जैकेट उपलब्ध कराए गए थे?
- क्या क्रूज पूरी तरह से सुरक्षा मानकों के अनुरूप फिट था?
ये ऐसे सवाल हैं जो सीधे-सीधे प्रशासनिक निर्णय प्रक्रिया और निगरानी व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं।
मौत को भी मात दे गई मां की ममता – ममता की अंतिम पराकाष्ठा – एक माँ को नमन– रेस्क्यू के दौरान आगरा की स्पेशल डाइविंग टीम ने जब पानी की गहराइयों में कदम रखा, तो उनकी रूह कांप गई। मलबे के बीच दिल्ली से आई मरीना मैसी का शव मिला, जिसने अपने 4 साल के मासूम बेटे त्रिशान को अपनी लाइफ जैकेट के भीतर कलेजे से इस कदर चिपका रखा था कि मौत की लहरें भी उन्हें अलग नहीं कर सकीं। 12 घंटे बीत जाने के बाद भी मां की पकड़ ढीली नहीं पड़ी थी। यह दृश्य उस ममता को नमन करने जैसा था, जो अंतिम सांस तक अपने बच्चे के लिए ढाल बनी रही। लेकिन अफ़सोस, जिस ममता ने मौत को शर्मा दिया, उसे यह ‘निरंकुश तंत्र’ नहीं बचा सका।
लापरवाही का पुराना खिलाड़ी और मेहरबान सरकार यह हादसा कई गंभीर सवाल खड़े करता है। जब आंधी-तूफान का अलर्ट था, तो क्रूज को लहरों के बीच जाने की अनुमति किसने दी? क्या सुरक्षा मानकों की जांच सिर्फ कागजों तक सीमित थी? सवाल पर्यटन विभाग के एमडी दिलीप यादव (IAS) पर भी हैं। वही दिलीप यादव, जिनके इंदौर नगर निगम कमिश्नर रहते सीवर युक्त पानी की सप्लाई से मासूमों की जान गई थी, लेकिन सजा मिलने के बजाय उन्हें ‘ईनाम’ के तौर पर पर्यटन विभाग की कमान सौंप दी गई। क्या मध्यप्रदेश में अधिकारियों की कार्यप्रणाली नहीं, बल्कि उनकी ‘जाति’ और ‘पहुंच’ कार्रवाई का आधार तय करती है? बलि का बकरा हमेशा की तरह निचले कर्मचारियों को ही बनाया जाएगा, जबकि मलाई काटने वाले ऊंचे पदों पर आसीन ‘साहब’ बेदाग निकल जाएंगे।
मुखिया के ठहाके और विपक्ष का सन्नाटा एक तरफ प्रदेश का हृदय रो रहा था, जबलपुर की लहरें लाशें उगल रही थीं, वहीं दूसरी तरफ प्रदेश के मुखिया सोशल मीडिया पर ठहाके लगाते हुए अपनी तस्वीरें साझा करने में मस्त थे। यह संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है। प्रदेश में विपक्ष का अस्तित्व भी केवल नाम मात्र का रह गया है, जो जनता की आवाज बनने में पूरी तरह नाकाम है। क्या प्रदेश के मुखिया वाकई इस गरिमामय पद के योग्य हैं, जब उन्हें अपनी जनता के आंसू तक दिखाई नहीं देते?
आज भले ही इस घटना पर जांच की फाइलें चढ़ाकर पर्दा डाल दिया जाए, लेकिन उन अभागे माता-पिता और उजड़े परिवारों की ‘आह’ इस सत्ता को कभी माफ नहीं करेगी। मरीना जैसी माताओं का बलिदान हमें याद दिलाता रहेगा कि व्यवस्था भले ही ‘अंधी’ हो जाए, लेकिन ममता कभी हार नहीं मानती।
दर्द जो भुलाया नहीं जा सकता- इस हादसे ने कई परिवारों को हमेशा के लिए बदल दिया।
उनके लिए यह सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि जीवनभर का दर्द है।
🌺 नमन उस माँ को…
“बड़ा ही पावन बड़ा ही भावन मन भावन एक नाता, एक तरफ हो दुनिया सारी एक तरफ हो माता।”