✍️ डॉ. महेश प्रसाद मिश्रा / भोपाल / ग्वालियर।

 मध्य प्रदेश की मोहन यादव सरकार एक बार फिर विपक्ष और सोशल मीडिया के निशाने पर है। मामला ग्वालियर का है, जहाँ पुलिस रिकॉर्ड में छह महीने से ‘फरार’ घोषित बलात्कार का आरोपी मकरंद बौद्ध न केवल खुलेआम घूमता पाया गया, बल्कि पुलिस के आला अधिकारियों के साथ उसकी मौजूदगी ने प्रदेश की कानून व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है।

फरार अपराधी, पुलिस की मेहमाननवाजी और ‘सियासी सेटिंग’

सोशल मीडिया पर वायरल हो रही तस्वीरों ने पुलिस महकमे में हड़कंप मचा दिया है। तस्वीरों में साफ़ देखा जा सकता है कि जिस मकरंद बौद्ध को ग्वालियर पुलिस ढूंढने का दावा कर रही थी, वह:

  • ग्वालियर CSP हिना खान की शादी में बेखौफ शामिल हुआ।
  • पुलिस DIG को मुस्कुराते हुए गुलदस्ता भेंट कर रहा था।
  •  

हैरानी की बात यह है कि इस दौरान पुलिस ने उसे ‘पहचाना’ तक नहीं। आरोप है कि मकरंद बौद्ध ने इसी दौरान थाने जाकर अनिल मिश्रा के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई, जिसके आधार पर मिश्रा की गिरफ्तारी हुई। चर्चा है कि यह सब एक सोची-समझी रणनीति के तहत किया गया ताकि अनिल मिश्रा की जमानत में अड़चनें पैदा की जा सकें।

ब्राह्मण विरोध और वोट बैंक की राजनीति का आरोप

इस पूरे घटनाक्रम को अब जातिगत रंग भी मिलने लगा है। आलोचकों का कहना है कि मोहन सरकार, संघ और भाजपा की विचारधारा अब ‘ब्राह्मण विरोध’ पर टिक गई है। आरोप लगाया जा रहा है कि गैर-ब्राह्मण वोटों के ध्रुवीकरण के लिए जानबूझकर ऐसे समीकरण बनाए जा रहे हैं। सोशल मीडिया पर लोग इसे विदेशी एजेंसियों की शह पर देश को अस्थिर करने वाली साजिश का हिस्सा बता रहे हैं।

दिखावे की गिरफ्तारी और ‘बलात्कारी प्रेम’ पर बवाल

जब सोशल मीडिया पर पुलिस की थू-थू होने लगी, तब जाकर मकरंद बौद्ध को गिरफ्तार किया गया। लेकिन दावों के मुताबिक, उसे अगले ही दिन छोड़ दिया गया। इससे यह संदेश जा रहा है कि सरकार अपराधियों को संरक्षण दे रही है।

जनता के बीच उठते कुछ तीखे सवाल:

  1. जो अपराधी छह महीने से फरार था, वह CSP की शादी में कैसे पहुँच गया?
  2. क्या पुलिस विभाग इतना पंगु हो गया है कि सामने खड़े इनामी/फरार अपराधी को नहीं पहचान पाया?
  3. क्या अनिल मिश्रा को फंसाने के लिए एक बलात्कारी का मोहरे के तौर पर इस्तेमाल किया गया?

मोहन यादव के मुख्यमंत्री बनने के बाद से प्रदेश में हत्या, लूट और बलात्कार जैसी घटनाओं में जो कथित बढ़ोतरी देखी जा रही है, उसने “सुशासन” के दावों पर सवालिया निशान लगा दिया है। अगर एक बलात्कारी पुलिस की सुरक्षा में घूम रहा है, तो आम जनता खुद को सुरक्षित कैसे समझे?

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