रथयात्रा स्नान मेला, जिसे स्नान पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है, जगन्नाथ उत्सव की शुरुआत का सबसे महत्वपूर्ण और पहला चरण है। ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा पर होने वाले इस महास्नान का उद्देश्य भक्तों को पापों से मुक्ति दिलाना, आध्यात्मिक शुद्धि करना और रथयात्रा से पहले प्रभु को तैयार करना है
धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से इस स्नान मेला का महत्व निम्नलिखित है:प्रथम सार्वजनिक दर्शन: यह वर्ष का एकमात्र ऐसा समय होता है जब भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा गर्भगृह से बाहर आकर भक्तों को खुले में दर्शन देते हैं。108 कलशों से महास्नान: इस दिन पवित्र जल, जड़ी-बूटियों और सुगंधित इत्र से युक्त 108 स्वर्ण कलशों से देवताओं का अभिषेक किया जाता है。
गज वेश (हाथी का रूप): स्नान के पश्चात प्रभु जगन्नाथ और बलभद्र को ‘गजानन वेश’ (हाथी के रूप) से अलंकृत किया जाता है。 मान्यता है कि यह रूप अपने भक्त ‘गणपति भट्ट’ की निष्कपट भक्ति का मान रखने के लिए धारण किया गया था。अनवसर काल: स्नान के बाद देवताओं को सर्दी-बुखार हो जाता है, जिसके कारण वे 15 दिनों के लिए एकांतवास (अनवसर काल) में चले जाते हैं और उनका उपचार किया जाता है。नवयौवन दर्शन: एकांतवास के बाद, जब प्रभु पूरी तरह स्वस्थ हो जाते हैं, तब उनके दर्शन ‘नवयौवन’ के रूप में होते हैं, जो सीधे तौर पर भव्य रथयात्रा की शुरुआत का प्रतीक है。
वही काशी (वाराणसी) में भी रथयात्रा उत्सव का शुभारंभ ‘स्नान मेला’ (देव स्नान पूर्णिमा) से होता है。 ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन अस्सी स्थित ऐतिहासिक श्री जगन्नाथ मंदिर में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा का महास्नान कराया जाता है。 इस खास दिन तीनों विग्रह विशेष रूप (गणेश स्वरूप) में भक्तों को दर्शन देते हैं
दिव्य स्नान: ज्येष्ठ पूर्णिमा तिथि पर श्रद्धालु 84 घाटों से गंगाजल कलशों में भरकर लाते हैं。 इसमें मातृशक्ति (पीली साड़ी पहनी महिलाओं के समूह) बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती हैं。 सुगंधित जल और 108 कलशों से प्रभु का महास्नान होता है。
रिपोर्ट अंजनी मिश्रा