✍️ डॉ. महेश प्रसाद मिश्रा, भोपाल की कलम से

विशेष रिपोर्ट | वैचारिक विश्लेषण

इतिहास गवाह है कि यदि दुनिया में सबसे अधिक संगठित, वैचारिक और संस्थागत नफ़रत किसी ने झेली है, तो वे हिंदू और यहूदी हैं। सवाल उठता है—आख़िर क्यों?

यह नफ़रत केवल सड़कों या सोशल मीडिया तक सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया की नामचीन यूनिवर्सिटियों और बौद्धिक मंचों तक में दिखाई देती है।Harvard University जैसी प्रतिष्ठित संस्था में फ़िलिस्तीन समर्थित आतंकी संगठनों को “फ्रीडम फाइटर” के रूप में प्रस्तुत करने के प्रयास होते हैं, जबकि दूसरी ओर भारत में Jamia Millia Islamia और Jawaharlal Nehru University जैसे परिसरों में कश्मीरी पंडितों के नरसंहार को “प्रोपेगेंडा” कहकर नकारा जाता है।

हैरानी की बात यह है कि जिन कश्मीरी पंडितों ने अपनी ही धरती पर भय, पलायन और नरसंहार झेला—उनके दर्द को स्वीकार करने से भी इन वैचारिक समूहों को परहेज़ है।उन्हें यह मानने में ही कठिनाई होती है कि किसी समुदाय को उसकी पहचान के कारण घर-आंगन से बेदखल किया जा सकता है।

एक ओर एक विशेष समुदाय को “अल्पसंख्यक” की संज्ञा दी जाती है, जबकि वास्तविकता यह है कि वह दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी का हिस्सा है।दूसरी ओर,

👉 जिन त्योहारों में खुलेआम रक्तपात होता है, उन्हें सांस्कृतिक परंपरा कहा जाता है,

👉 लेकिन हिंदुओं के त्योहारों को नफ़रत और असहिष्णुता का प्रतीक बना दिया जाता है।

विश्लेषकों का मानना है कि इस बढ़ती नफ़रत की सबसे बड़ी वजह यह है कि अब हिंदू और यहूदी चुप नहीं हैं।सदियों से चले आ रहे झूठे नैरेटिव, इतिहास की तोड़-मरोड़ और वैचारिक दमन की जंजीरों को तोड़कर—

👉 अब वे अपने साथ हुई प्रताड़नाओं का हिसाब माँग रहे हैं,

👉 अपनी मातृभूमि, संस्कृति और परंपराओं की रक्षा कर रहे हैं,

👉 और अन्याय के विरुद्ध खुलकर खड़े हो रहे हैं।

हिंदू और यहूदी—दोनों ही ऐसे समुदाय हैं जिन्होंने

👉 हज़ारों वर्षों के आक्रमण, पलायन और उत्पीड़न के बावजूद

👉 न अपना धर्म छोड़ा,

👉 न अपने संस्कार छोड़े,

👉 और न ही अपनी पहचान से समझौता किया।

यही उनकी सबसे बड़ी “गलती” मानी जा रही है। आज भी इन दो सभ्यताओं की आवाज़ को दबाने की कोशिशें जारी हैं—कभी अकादमिक बहस के नाम पर, कभी मानवाधिकार की आड़ में, तो कभी सेक्युलरिज़्म के हथियार से।

लेकिन इतिहास यह भी बताता है—हिंदू झुका है,रुका है, और ही मिटाया जा सकता है।

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