✍️ डॉ. महेश प्रसाद मिश्रा, भोपाल की कलम से

बांग्लादेश में हिंदुओं की आज जो दयनीय स्थिति है, उसकी जड़ें 1971 के उसी निर्णायक दौर में छिपी हैं, जब इतिहास को नया मोड़ दिया जा सकता था। उस समय आयरन लेडी इंदिरा गांधी के समक्ष प्रख्यात मूर्तिकार और विचारक चितरंजन सुतार ने एक स्पष्ट मांग रखी थी—एक अलग बंगाली हिंदू राष्ट्र। परिस्थितियाँ ऐसी थीं कि यह मांग अव्यावहारिक नहीं थी, पर दुर्भाग्यवश इसे न तो राजनीतिक समर्थन मिला और न ही स्वयं बांग्लादेशी हिंदू समाज का संगठित साथ।

समय बीतता गया, पर यह मांग पूरी तरह मरी नहीं। फिर 2003 से 2006 के बीच, भारत–बांग्लादेश संबंधों को “मधुर” बनाए रखने की कीमत पर इस विचार और इससे जुड़े संघर्षशील नेतृत्व को सुनियोजित तरीके से कुचल दिया गया। बताया जाता है कि अरुण कुमार घोष, धीरेन्द्र नाथ पाल और कालिदास वैद्य (काली दा) जैसे नेताओं को एक-एक कर पकड़कर बांग्लादेश के हवाले किया गया, जहाँ उन्हें अमानवीय यातनाओं और क्रूर अंत का सामना करना पड़ा।

आज सवाल यह नहीं कि “अब क्या किया जाए”, सवाल यह है कि तब क्यों चुप्पी साधी गई?यह भी सवाल है कि सेक्युलरिज़्म के नाम पर किन मूल्यों की बलि दी गई?आज भारत में बैठकर शोक जताने से ज़मीनी सच्चाई नहीं बदलती—वहाँ तो आंसू तब भी बह रहे थे और आज भी बह रहे हैं। यह केवल इतिहास की बात नहीं, यह एक अधूरी जिम्मेदारी, दबाई गई आवाज़ों और राजनीतिक प्राथमिकताओं की कीमत की कहानी है—जिसका खामियाजा बांग्लादेश के हिंदू आज भी भुगत रहे हैं।

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