पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में भाजपा ने ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को करारी हार दी है। 294 सीटों वाली विधानसभा में भाजपा 200 से अधिक सीटों पर मजबूत बढ़त बनाए हुए है और पहली बार राज्य में सरकार बनाने जा रही है। यह जीत कोई संयोग नहीं, बल्कि लंबे समय की रणनीति, संगठनात्मक मजबूती और बूथ-स्तरीय जमीनी काम का नतीजा है। और इस पूरे अभियान के पीछे का मास्टरमाइंड है भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव सुनील बंसल। 
सुनील बंसल को भाजपा का सबसे भरोसेमंद और सफल रणनीतिकार माना जाता है। अमित शाह के करीबी और संगठन के मास्टर माइंड के रूप में वे उत्तर प्रदेश में भाजपा की लगातार जीतों के प्रमुख आर्किटेक्ट रहे हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में यूपी में 80 में से 71 सीटें जीतने, 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की भारी बहुमत वाली सरकार बनाने, 2019 के लोकसभा में फिर से कमाल और 2022 के विधानसभा चुनाव में दोबारा सत्ता कायम रखने में सुनील बंसल की भूमिका निर्णायक रही। यूपी में उन्होंने ‘पन्ना प्रमुख’ मॉडल, जातीय समीकरणों की बारीक समझ और हर बूथ पर मजबूत संगठन खड़ा करके भाजपा को अजेय बनाया। उनकी सफलता दर को देखते हुए उन्हें 100% सक्सेस रेट वाला रणनीतिकार कहा जाता है—जिस राज्य में वे जिम्मेदारी संभालते हैं, वहां भाजपा जीत हासिल ही करती है। 
2022 में अमित शाह और जेपी नड्डा ने सुनील बंसल को पश्चिम बंगाल, ओडिशा और तेलंगाना का प्रभारी बनाया। बंगाल में टीएमसी के कड़े कदरों और संगठनात्मक ताकत को देखते हुए यह चुनौती सबसे बड़ी थी। लेकिन बंसल जी ने बिना हिचकिचाहट के कमान संभाली। उन्होंने पुराने और नए कार्यकर्ताओं को मिलाकर नई कमेटियां बनाईं, जिला अध्यक्षों को टिकट न देने का सख्त नियम बनाया ताकि संगठन पहले, व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा बाद में। सबसे महत्वपूर्ण—‘पन्ना प्रमुख’ मॉडल को बंगाल में भी लागू किया, जिससे हर बूथ पर एक-एक कार्यकर्ता को जिम्मेदारी दी गई। टीएमसी के कैडर-बेस्ड सिस्टम को इस मॉडल से सीधा मुकाबला मिला। 
‘भय आउट, ट्रस्ट इन’ (Fear Out, Trust In) नारा सुनील बंसल ने ही दिया, जो बंगाल की जनता के मन में घर कर गया। इस नारे ने विकास, कानून-व्यवस्था और विश्वास की राजनीति को केंद्र में रखा। भूपेंद्र यादव, बिप्लब देव, अनिल मालवीय और अमित मालवीय जैसे सहयोगियों के साथ मिलकर उन्होंने पूरी रणनीति को अमली जामा पहनाया। ममता बनर्जी और टीएमसी को इस रणनीति ने पूरी तरह चौंका दिया। एग्जिट पोल से लेकर अब तक के रुझानों में भाजपा की भारी जीत इसी रणनीति का प्रमाण है। 
सुनील बंसल का तरीका हमेशा एक ही रहा है—माइक्रो मैनेजमेंट। वे बड़े-बड़े भाषण नहीं देते, बल्कि बूथ स्तर पर काम करते हैं। यूपी में उन्होंने जो किया, वही बंगाल में दोहराया। नतीजा—बंगाल की राजनीति में पहली बार भाजपा की सत्ता। यह जीत केवल एक चुनाव की नहीं, बल्कि संगठन की जीत है।
सुनील बंसल ने साबित कर दिया कि सच्चा रणनीतिकार वही होता है जो हर चुनौती को अवसर में बदल दे। बंगाल की जनता ने ‘भय आउट’ कर दिया और ‘ट्रस्ट इन’ भाजपा पर जताया। अब विकास की नई सुबह बंगाल में शुरू होने जा रही है—और इसका श्रेय सबसे पहले सुनील बंसल जी की दूरदर्शी रणनीति को जाता है।