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By ANAND KISHOR KISHOR • 2026-02-21 09:18 • 4 views   Share WhatsApp Share Facebook Share X
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🟥 सरकारी अस्पतालों का कड़वा सच — ‘स्टॉक नहीं है’ या सिस्टम की लापरवाही? "सरकारी अस्पताल की खिड़की पर जब “स्टॉक नहीं है” का बोर्ड लटकता है, तो असल में वह एक गरीब मरीज की आखिरी उम्मीद पर ताला होता है।" राज्यसभा के बजट सत्र में सांसद राघव चड्ढा ने उसी सच्चाई को आवाज दी, जिसे आम लोग हर रोज सरकारी अस्पतालों की लंबी लाइनों में खड़े होकर महसूस करते हैं। देश के कई सरकारी अस्पतालों में मरीजों की शिकायत लगभग एक जैसी है — डॉक्टर पूरी दवा लिखते हैं, लेकिन सरकारी दवाई काउंटर से सिर्फ कुछ सस्ती दवाइयां मिलती हैं। बाकी जरूरी दवाइयों के लिए मरीजों को बाहर के प्राइवेट मेडिकल स्टोर भेज दिया जाता है। अक्सर जवाब मिलता है — “सप्लाई नहीं आई है”, जबकि सवाल यह है कि आखिर गरीबों के लिए आई मुफ्त दवाइयां जा कहां रही हैं? 👉 क्या सिस्टम में कहीं गड़बड़ी है? 👉 क्या सरकारी दवाइयों की कालाबाजारी हो रही है? 👉 क्या मुफ्त इलाज सिर्फ कागजों तक सीमित है? गरीब मरीज 200-300 रुपये की दवाई के लिए भी संघर्ष करता है, लेकिन उसकी आवाज सुनने वाला कोई नहीं होता। संसद में उठी यह बहस अब आम जनता की बहस बन चुकी है। 💬 क्या आपके साथ या आपके किसी परिचित के साथ ऐसा हुआ है? अपना अनुभव कमेंट में जरूर लिखें — आपकी आवाज ही बदलाव की शुरुआत है। ✍️ Journalist Anand Kishor अस्वीकरण (Disclaimer): इस लेख में व्यक्त किए गए विचार, राय, कथन और जानकारी पूर्णतः लेखक के व्यक्तिगत हैं और ये Indian Press Union की आधिकारिक नीति, दृष्टिकोण या विचारों का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं। Indian Press Union इस सामग्री की शुद्धता, पूर्णता या विश्वसनीयता के संबंध में कोई दावा या गारंटी नहीं देता तथा इस लेख के प्रकाशन से उत्पन्न किसी भी प्रकार की जिम्मेदारी से स्वयं को स्पष्ट रूप से अलग करता है। इस लेख की सामग्री और इसके प्रकाशन से उत्पन्न किसी भी परिणाम के लिए पूर्णतः लेखक ही उत्तरदायी होगा।