”शिकायत से देश नहीं बदलता”
“अफ़रातफ़री से सृजन की ओर, कर्म ही परिवर्तन का मार्ग है”
आज की पीढ़ी के भीतर बेचैनी है, असंतोष है और जल्द से जल्द सब कुछ पा लेने की आकांक्षा है। हर कोई व्यवस्था को बदलना चाहता है, समाज से शिकायत करता है और देश से उम्मीद रखता है - लेकिन प्रश्न यह है कि हम स्वयं देश के लिए क्या कर रहे हैं?
ओशो की दृष्टि से देखें तो समस्या संसार में उतनी नहीं है, जितनी मनुष्य की चेतना में है। हम परिवर्तन चाहते हैं, लेकिन अपने भीतर परिवर्तन लाने के लिए तैयार नहीं। हम परिणाम चाहते हैं, लेकिन कर्म की तपस्या से बचना चाहते हैं।
याद रखो, केवल इच्छा से इतिहास नहीं बनता, कर्म से बनता है।
स्वामी विवेकानन्दजी कहते थे जो व्यक्ति अपने जीवन में ईमानदारी, अनुशासन, श्रम और जिम्मेदारी को उतार देता है, वही समाज को बदलने की शुरुआत करता है। देश किसी सरकार, नेता या व्यवस्था मात्र से महान नहीं बनता; देश उसके नागरिकों के चरित्र, परिश्रम और कर्म से महान बनता है।
आज के युवा के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल बेरोजगारी या अवसरों की कमी नहीं, बल्कि धैर्य की कमी और तुरंत परिणाम पाने की मानसिकता भी है। सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता। जीवन में जो स्थायी है, वह धीरे-धीरे निर्मित होता है, जैसे चरित्र, ज्ञान, विश्वास और राष्ट्र।
यदि भारत को फिर से “सोने की चिड़िया” बनाना है, तो केवल अतीत का गौरव गाने से काम नहीं चलेगा। हमें वर्तमान में अपने तन से श्रम, मन से विचार, वचन से सत्य और कर्म से ईमानदारी देनी होगी।
अपने काम को छोटा मत समझो। किसान का खेत, मजदूर का श्रम, शिक्षक का ज्ञान, व्यापारी की ईमानदारी, वैज्ञानिक का अनुसंधान, युवा की मेहनत और नागरिक का कर्तव्य, इन सबके योग से राष्ट्र बनता है।
अफ़रातफ़री में भीड़ बढ़ती है,
लेकिन सजग कर्म से समाज बनता है।
इसलिए शिकायत कम करो, योगदान अधिक करो।
दूसरों से उम्मीद कम रखो, स्वयं से अपेक्षा अधिक रखो।
देश को बदलने से पहले अपने भीतर के आलस्य, अहंकार और असंतोष को बदलो।
भारत का भविष्य किसी और के हाथ में नहीं है, वह हमारे आज के कर्मों में छिपा है।
जब करोड़ों हाथ ईमानदारी से काम करेंगे, करोड़ों मन सकारात्मक सोचेंगे और करोड़ों वचन सत्य एवं सदभाव बोलेंगे, तभी भारत केवल “सोने की चिड़िया” कहलाएगा नहीं, बल्कि विश्व के सामने कर्म, चेतना और मानवता का उदाहरण बनेगा।