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आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अधिनियम, 2026 की मांग: लैंगिक न्याय और सामाजिक सुरक्षा पर बहस
ओपिनियन | लेखिका: डॉ. रेनू सरकार
भारत की आंगनवाड़ी व्यवस्था को पांच दशक पूरे हो चुके हैं। इस दौरान आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं ने पोषण, प्रारंभिक बाल देखभाल, स्वास्थ्य जागरूकता और सरकारी कल्याणकारी सेवाओं को जमीनी स्तर तक पहुंचाने में भूमिका निभाई है। 31 जुलाई 2026 तक देश में लगभग 13.31 लाख आंगनवाड़ी कार्यकर्ता पद पर थीं।
इतने बड़े कार्यबल की भूमिका को देखते हुए उनकी सेवा शर्तों, सामाजिक सुरक्षा और कानूनी स्थिति को लेकर समय-समय पर बहस होती रही है। इसी संदर्भ में एक अलग व्यापक “आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अधिनियम, 2026” बनाने की मांग भी एक नीतिगत प्रस्ताव के रूप में सामने रखी जा सकती है।
आंगनवाड़ी व्यवस्था में बढ़ती जिम्मेदारियां
आंगनवाड़ी कार्यकर्ता केवल पूरक पोषण वितरण तक सीमित नहीं हैं। सरकारी कार्यक्रमों के तहत वे बच्चों की वृद्धि की निगरानी, प्रारंभिक बाल देखभाल और शिक्षा, पोषण एवं स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता तथा विभिन्न सरकारी सेवाओं के जमीनी क्रियान्वयन में योगदान देती हैं। POSHAN Tracker जैसी डिजिटल व्यवस्था के माध्यम से आंगनवाड़ी सेवाओं की निगरानी और रिकॉर्डिंग भी की जाती है।
समय के साथ इन कार्यों के प्रशासनिक और डिजिटल पहलुओं में भी वृद्धि हुई है। ऐसे में कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियों और उपलब्ध संसाधनों के बीच संतुलन पर नीति स्तर पर चर्चा महत्वपूर्ण हो सकती है।
कानूनी दर्जे और सामाजिक सुरक्षा का प्रश्न
आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की कानूनी स्थिति पर बहस का एक प्रमुख पहलू यह है कि उन्हें किस प्रकार का सेवा दर्जा और सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध होनी चाहिए। सरकारी दस्तावेजों में आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को मानदेय प्राप्त करने वाले कार्यकर्ताओं के रूप में वर्णित किया गया है और उन्हें नियमित सरकारी कर्मचारी के रूप में वर्गीकृत करने का प्रश्न अलग कानूनी एवं नीतिगत संदर्भ रखता है।
ऐसे में प्रस्तावित कानून के समर्थक यह तर्क दे सकते हैं कि सेवा शर्तों, पारिश्रमिक, सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य बीमा, मातृत्व लाभ, दुर्घटना सुरक्षा और शिकायत निवारण के लिए अधिक स्पष्ट वैधानिक व्यवस्था बनाई जानी चाहिए।
लैंगिक दृष्टिकोण
आंगनवाड़ी कार्यबल में महिलाओं की बड़ी भागीदारी होने के कारण उनकी सेवा शर्तों पर चर्चा का लैंगिक पहलू भी है। नीति-निर्माण में यह प्रश्न उठाया जा सकता है कि महिलाओं द्वारा किए जा रहे सामुदायिक और सार्वजनिक कार्य को पर्याप्त सामाजिक सुरक्षा, कार्यस्थल की गरिमा और प्रभावी शिकायत निवारण व्यवस्था किस सीमा तक मिल रही है।
इस दृष्टिकोण से प्रस्तावित कानून को केवल मानदेय बढ़ाने के प्रश्न तक सीमित रखने के बजाय सामाजिक सुरक्षा, सुरक्षित कार्य परिस्थितियों, प्रशिक्षण और व्यावसायिक विकास जैसे विषयों को भी शामिल करने पर विचार किया जा सकता है।
संभावित कानून में क्या प्रावधान हो सकते हैं?
नीतिगत प्रस्ताव के रूप में ऐसे कानून में न्यूनतम राष्ट्रीय सेवा मानक, पारिश्रमिक की पारदर्शी व्यवस्था, सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं दुर्घटना बीमा, मातृत्व संबंधी सुरक्षा, सुरक्षित कार्य परिस्थितियां, शिकायत निवारण और प्रशिक्षण जैसे प्रावधानों पर विचार किया जा सकता है।
इसके साथ राज्यों को राष्ट्रीय न्यूनतम मानकों से बेहतर लाभ देने की स्वतंत्रता देने का मॉडल भी प्रस्तावित किया जा सकता है। इससे संघीय ढांचे के भीतर राज्यों की भूमिका बनी रह सकती है और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अतिरिक्त सुविधाएं विकसित की जा सकती हैं।
प्रारंभिक बाल विकास और मानव पूंजी
आंगनवाड़ी व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य बच्चों के पोषण और प्रारंभिक विकास से जुड़ा है। केंद्र सरकार की Mission Saksham Anganwadi and POSHAN 2.0 व्यवस्था पोषण और प्रारंभिक बाल विकास से संबंधित सेवाओं को एकीकृत ढांचे में संचालित करती है।
इसलिए आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की कार्य परिस्थितियों पर होने वाली चर्चा को केवल रोजगार या प्रशासनिक व्यय के प्रश्न के रूप में नहीं, बल्कि बच्चों और परिवारों तक पहुंचने वाली सार्वजनिक सेवाओं की गुणवत्ता के संदर्भ में भी देखा जा सकता है।
राष्ट्रीय मानक और राज्यों की भूमिका
एक संभावित केंद्रीय कानून आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के लिए न्यूनतम राष्ट्रीय अधिकार और सेवा मानक निर्धारित कर सकता है। राज्यों को इन मानकों से आगे जाकर अतिरिक्त लाभ देने की अनुमति दी जा सकती है। हालांकि, ऐसे किसी कानून की वास्तविक रूपरेखा, वित्तीय दायित्व और केंद्र-राज्य जिम्मेदारियां विधायी और नीतिगत प्रक्रिया के दौरान तय करनी होंगी।
नीतिगत बहस की आवश्यकता
आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की संख्या और उनकी जमीनी भूमिका को देखते हुए उनकी सेवा शर्तों पर राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक चर्चा की जा सकती है। इस चर्चा में कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियां, वर्तमान मानदेय और सामाजिक सुरक्षा, डिजिटल कार्यभार, प्रशिक्षण, कार्यस्थल की सुविधाएं और शिकायत निवारण जैसे विषय शामिल हो सकते हैं।
“आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अधिनियम, 2026” वर्तमान में इस लेख में प्रस्तुत एक नीतिगत प्रस्ताव है। इसे लागू करने के लिए संसद की विधायी प्रक्रिया, वित्तीय प्रभाव का आकलन और केंद्र-राज्य जिम्मेदारियों पर विस्तृत विचार आवश्यक होगा।
आंगनवाड़ी व्यवस्था के पांच दशक पूरे होने के बाद कार्यकर्ताओं की भूमिका और उनकी सेवा शर्तों पर नए सिरे से चर्चा का यह एक अवसर हो सकता है। प्रस्तावित कानून की मांग इसी व्यापक नीति बहस का हिस्सा है।
लेखिका: डॉ. रेनू सरकार
पिछले 45 वर्षों से जेंडर राइट्स एक्टिविस्ट