जयपुर में ‘Love Lottery’ की विशेष स्क्रीनिंग: अतुल सुभाष को श्रद्धांजलि, पुरुषों के दर्द और समान न्याय की उठी आवाज़
**जयपुर, 3 अक्टूबर 2026:** सिनेमा की एक शाम उस समय संवेदना, स्मृति और न्याय की चर्चा में बदल गई, जब **LegitMentoor.in** ने जयपुर के Cinepolis, Jewel of India Mall में फिल्म *Love Lottery* की विशेष स्क्रीनिंग आयोजित की। कार्यक्रम में **अतुल सुभाष के भाई बिकास मोदी**, उनके मित्रों और समर्थकों की उपस्थिति ने माहौल को बेहद भावुक बना दिया।
कार्यक्रम में अतुल सुभाष को श्रद्धांजलि देते हुए उन पुरुषों को भी याद किया गया, जिन्होंने वैवाहिक विवादों, पारिवारिक तनाव, सामाजिक दबाव और लंबी कानूनी लड़ाइयों के बीच अपनी जान गंवाई। हाल के वर्षों में पुरुष आत्महत्याओं से जुड़ी घटनाओं ने एक कठिन सवाल सामने रखा है—**क्या हम पुरुषों की मानसिक पीड़ा को तब तक अनदेखा करते रहते हैं, जब तक बहुत देर नहीं हो जाती?**
पुरुष भी पिता, बेटे, भाई और पति हैं। वे भी डरते हैं, टूटते हैं और कभी-कभी मदद मांगने की स्थिति में भी नहीं होते। आत्महत्या जैसी त्रासदियों को किसी एक कारण या कानून से जोड़ना उचित नहीं होगा, लेकिन वैवाहिक मुकदमों में मानसिक स्वास्थ्य और दोनों पक्षों की गरिमा पर गंभीर चर्चा आवश्यक है।
## कानून सुरक्षा दे, लेकिन न्याय भी समान हो
*Love Lottery* इसी संवेदनशील बहस को बड़े पर्दे पर लाती है। निर्देशक **अरविंद पांडे** और निर्माता **कुलदीप भार्गव ‘तुषार’** की यह फिल्म वैवाहिक विवादों, आरोपों और उनके परिवार पर पड़ने वाले प्रभाव को सामने लाती है।
कार्यक्रम का संदेश महिलाओं को मिलने वाली कानूनी सुरक्षा को कमजोर करना नहीं, बल्कि **निष्पक्ष और प्रमाण-आधारित न्याय** की आवश्यकता पर जोर देना था। वास्तविक पीड़ित महिला को पूरी सुरक्षा और त्वरित न्याय मिलना चाहिए; उसी तरह झूठे या अतिरंजित आरोपों का सामना कर रहे पुरुष और उनके परिवार को भी निष्पक्ष सुनवाई मिलनी चाहिए।
**कानून का उद्देश्य किसी लिंग को दोषी मानना नहीं, बल्कि पीड़ित को न्याय देना होना चाहिए।**
इसी सोच के साथ LegitMentoor कानूनी शिक्षा, केस एवं दस्तावेज प्रबंधन, निर्णयों की जानकारी और AI आधारित कानूनी मार्गदर्शन के माध्यम से नागरिकों को जागरूक करने का प्रयास कर रहा है।
अतुल सुभाष को दी गई श्रद्धांजलि अंततः एक बड़ी अपील बन गई—**हमें ऐसे कानूनी सुधारों की आवश्यकता है जहाँ महिला और पुरुष दोनों की बात सुनी जाए, कानून की व्याख्या लैंगिक पूर्वाग्रह से मुक्त हो और हर व्यक्ति को समान अधिकार, समान संवेदना तथा निष्पक्ष न्याय मिले।**
**न्याय तभी संपूर्ण है, जब कानून के सामने दर्द का भी कोई जेंडर न हो।**