मखाने की चमक के पीछे किसानों का संघर्ष: बाजार में बढ़ती कीमत, लेकिन मेहनतकश को कितना लाभ?
मखाने की चमक के पीछे किसानों का संघर्ष: बढ़ते बाजार में मेहनतकशों को कितना लाभ?
खेत से बाजार तक बढ़ती कीमतों के बीच मखाना किसानों और पारंपरिक कारीगरों की आर्थिक हिस्सेदारी पर बड़ा सवाल
विशेष रिपोर्ट | बिहार
बिहार का मखाना आज देश ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी अपनी पहचान बना चुका है। कभी स्थानीय बाजारों तक सीमित रहने वाला यह पारंपरिक उत्पाद आज सुपरफूड के रूप में बड़े ब्रांडों, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और आधुनिक रिटेल स्टोर तक पहुंच चुका है। मखाने की बढ़ती मांग ने इसके कारोबार को नई पहचान दी है, लेकिन इस विस्तार के बीच उन किसानों और श्रमिकों की आर्थिक स्थिति पर भी ध्यान देना जरूरी है, जो कठिन परिस्थितियों में इसका उत्पादन और प्रसंस्करण करते हैं।
भारत के मखाना उत्पादन में बिहार की हिस्सेदारी लगभग तीन-चौथाई बताई जाती है। पूर्णिया, कटिहार, मधुबनी, दरभंगा और सहरसा जैसे जिलों में बड़ी संख्या में परिवार इस व्यवसाय से जुड़े हैं। किसान तालाबों और जलभराव वाले खेतों में मेहनत करके मखाने के बीज इकट्ठा करते हैं। इसके बाद सुखाने, भूनने और फोड़ने जैसी प्रक्रियाओं से तैयार मखाना बाजार तक पहुंचता है।
किसान से व्यापारी तक बदलती कीमत
मखाने की पूरी मूल्य-श्रृंखला में कई हिस्सेदार शामिल होते हैं—किसान, बीज संग्रह करने वाले मजदूर, गुरिया से मखाना निकालने वाले कुशल कारीगर, बिचौलिये, थोक व्यापारी और अंतिम उत्पाद बेचने वाली कंपनियां। उत्पादन से लेकर बिक्री तक हर स्तर पर अलग-अलग लागत और मेहनत जुड़ी होती है।
फरवरी 2025 में प्रकाशित द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, कच्चे बीज और तैयार मखाने की कीमत में काफी अंतर देखा गया था। रिपोर्ट में कच्चे बीज की कीमत लगभग 300 रुपये प्रति किलोग्राम और तैयार मखाने की गुणवत्ता के अनुसार 800 से 1,400 रुपये प्रति किलोग्राम तक कीमत का उल्लेख किया गया था। कुछ ब्रांडेड उत्पाद खुदरा बाजार में इससे अधिक कीमत पर भी बेचे जाते हैं।
हालांकि, कच्चे बीज और तैयार मखाने की कीमत के इस अंतर को सीधे मुनाफा नहीं माना जा सकता। प्रसंस्करण, वजन में कमी, मजदूरी, परिवहन, भंडारण और पैकेजिंग जैसे खर्च भी इसमें शामिल होते हैं। फिर भी यह सवाल महत्वपूर्ण है कि बाजार में उत्पाद का मूल्य बढ़ने के साथ किसानों और श्रमिकों की आय में कितना सुधार हो रहा है।
कारीगरों की मेहनत भी कम महत्वपूर्ण नहीं
मखाना उद्योग में गुरिया से मखाना निकालने वाले कारीगरों का योगदान बेहद महत्वपूर्ण है। कच्चे बीज को भूनकर और फोड़कर सफेद मखाना तैयार करना अनुभव और कौशल का काम है। इसके बावजूद पारंपरिक श्रमिकों की आय, काम की परिस्थितियों और सामाजिक पहचान से जुड़े मुद्दों पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है। इस प्रक्रिया में महिला श्रमिकों की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है।
दूसरी ओर, बिचौलिये और व्यापारी किसानों से उत्पाद खरीदकर उसे आगे की मंडियों तक पहुंचाते हैं। इस प्रक्रिया में उनकी पूंजी, परिवहन और व्यापार से जुड़े जोखिम भी शामिल होते हैं। लेकिन जब किसानों को बाजार की वास्तविक कीमतों की जानकारी सीमित होती है और उनके पास खरीदारों के विकल्प कम होते हैं, तब उनकी सौदेबाजी की क्षमता प्रभावित हो सकती है।
सरकारी पहल और आगे की राह
केंद्र सरकार ने मखाना उद्योग को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय मखाना बोर्ड की स्थापना की पहल की है। इसका उद्देश्य मखाना उत्पादन, अनुसंधान, आधुनिक प्रसंस्करण, भंडारण, गुणवत्ता सुधार और विपणन को मजबूत करना है। इन प्रयासों के प्रभाव का आकलन किसानों और उद्योग से जुड़े अन्य लोगों को मिलने वाले वास्तविक लाभ के आधार पर किया जाना चाहिए।
इन पहलों की सफलता तभी सुनिश्चित हो सकेगी, जब किसानों को उचित मूल्य, गांवों में आधुनिक प्रसंस्करण सुविधाएं, सीधे बाजार तक पहुंच और किफायती वित्तीय सहायता मिले। साथ ही, मखाना तैयार करने वाले पारंपरिक कारीगरों को भी उचित पारिश्रमिक, सुरक्षित कार्यस्थल और बेहतर कार्य परिस्थितियां मिलनी चाहिए।
मखाना केवल बिहार का एक कृषि उत्पाद नहीं, बल्कि हजारों परिवारों की आजीविका का आधार है। इसकी बढ़ती बाजार मांग और अंतरराष्ट्रीय पहचान का वास्तविक लाभ तभी व्यापक रूप से दिखाई देगा, जब खेतों में मेहनत करने वाले किसान, पानी में उतरकर बीज निकालने वाले श्रमिक और मखाना तैयार करने वाले कारीगर भी आर्थिक रूप से मजबूत बनें।
आखिर सवाल यही है—जब मखाना बाजार में प्रीमियम उत्पाद के रूप में अपनी जगह बना चुका है, तो उसे पैदा करने और तैयार करने वाले मेहनतकशों की आय और जीवन स्तर में उसी अनुपात में सुधार कैसे सुनिश्चित किया जाए?
