"नदी" और "सपना" कवितायें
नदी
पहाड़ों से उतरती, कल-कल करती आई,
अपने साथ सौ कहानियाँ लाई।
न रुकी, न थकी, बस बहती गई,
पत्थरों को भी गीत सुनाती गई।
किनारे पर बैठे बचपन भीगे इसके पानी में,
दोपहर की धूप नहाती इसकी लहरों में।
गाँव की प्यास बुझाए, खेतों को जीवन दे,
फिर भी माँगती नहीं कुछ, बस देती ही रहे।
चाँदनी रात में जब चाँदी सी चमकती है,
लगता है धरती पर कोई सपना बहता है।
नदी सिखाती है—रुकना नहीं,
बहते रहो, मिलते रहो और सबको सींचते रहो।
सपना
तेरी हँसी का एक टुकड़ा उठाकर,
रात भर दिल में सजाता हूँ।
आँख बंद करूँ तो तू मिल जाती है,
इसीलिए तो नींद से दोस्ती निभाता हूँ।
सपनों में तेरे साथ चाय की चुस्की है,
बारिश में भीगे कंधे की खुशबू है।
न कोई दुनिया, न कोई फ़िक्र,
बस तेरा हाथ और मेरा सपना है।
तू जो पास हो तो हर रात ईद लगती है,
तेरा नाम लेते ही हर साँस दुआ लगती है।
जागकर भी मैं तुझे ही देखूँ,
ऐसा सपना हकीकत बन जाए तो क्या बात है।