नहर ने कब्जाया खेत!
नहर जो खेतों को सींचने का कार्य करती है, आज वही खेतों पर कब्जा कर रही है।
ब्लॉक अफजलगढ़ के राजस्व गाँव मुरादनगर में नहर गाटा संख्या 95 ने 14 वर्षों में चलते-चलते खेत गाटा संख्या 111 के 1460 वर्ग मीटर रकबे पर कब्जा कर लिया है।
अधिशासी अभियन्ता, अफजलगढ़ सिंचाई खण्ड, धामपुर के पत्रांक 156/अ0सि0ख0/जनसूचना/दिनांक 15/04/2010 द्वारा बताया गया कि मुरादनगर अल्पिका (नहर) का निर्माण 1966-67 में हुआ था। नहर निर्माण के पांच वर्ष बाद मौजा मुरादनगर की चकबंदी हुई। मुरादनगर के भू-चित्र पर चकबंदी सन् 1378 फसली, तदानुसार सन् 1971-72 अंकित है। चकबंदी के समय नहर गाटा संख्या 95 तथा नाली गाटा संख्या 110 के बीच खेत गाटा संख्या 111 बनाया गया। नहर और नाली के बीच बने खेत की पश्चिम दिशा की भुजा 28.8 मीटर तथा पूर्व दिशा की भुजा 67.43 मीटर थी। यह दूरी upbhunaksha.gov.in पर प्रदर्शित माप के अनुसार है। अधिशासी अभियन्ता, अफजलगढ़ सिंचाई खण्ड, धामपुर के पत्रांक 105 दिनांक 17/02/2010 के अनुसार खेत गाटा संख्या 111 पर नहर की पटरी की चौड़ाई 41 फुट (12.5 मीटर) है। इस प्रकार पश्चिम दिशा में नहर के मध्य से नाली 110 की दूरी 41.3 मीटर है।
यह नहर अपने निर्माण काल 1966-67 से 2011-12 तक अपने मूल स्थान पर रही। 2011 में खेत गाटा संख्या 111 के किसान ने ठियाबंदी की तत्कालीन धारा 41 एल.आर. एक्ट के तहत परगनाधिकारी धामपुर के न्यायालय में वाद दायर किया। खेत गाटा संख्या 111 की पैमाइश हुई। तत्कालीन पूर्व राजस्व निरीक्षक ने अपनी आख्या में बताया कि नहर अपने मूल स्थान पर है।
राजस्व निरीक्षक द्वारा समय से पैमाइश आख्या न देने के कारण प्रतिपक्षी की आपत्ति पर 13 वर्ष बाद राजस्व की आख्या न्यायालय द्वारा निरस्त कर दी गई और आवेदन निरस्त कर दिया गया। परगनाधिकारी के आदेश को मंडलायुक्त मुरादाबाद के न्यायालय में चुनौती दी गई। मंडलायुक्त ने परगनाधिकारी धामपुर के आदेश को त्रुटिपूर्ण मानकर परगनाधिकारी धामपुर को पुनः पैमाइश कराकर आख्या प्राप्त करने और गुण-दोष के आधार पर वाद निस्तारित करने के आदेश दिए।
मंडलायुक्त के आदेश के अनुपालन में राजस्व निरीक्षक द्वारा 04/05/2026 को खेत गाटा संख्या 111 की पैमाइश की गई। वर्तमान राजस्व निरीक्षक ने परगनाधिकारी के न्यायालय में दिनांक 14/05/2026 को हस्ताक्षरित आख्या सौंपी। अपनी पैमाइश आख्या में वर्तमान राजस्व निरीक्षक ने बताया कि “कि 14 मीटर पर प्रार्थी की भूमि पर नहर बन गई।”
लगता है बार-बार नपाई से नहर क्रुद्ध हो गई। खेत के अस्तित्व में आने से पांच वर्ष पहले बनी नहर ने खेत में घुसकर गाटा संख्या 111 की पश्चिम दिशा की भुजा पर खेत की ओर 14 मीटर चलकर खेत के 1460 वर्ग मीटर रकबे पर कब्जा कर लिया।
खेत गाटा संख्या 111 का मालिक प्रतिवर्ष लगान जमा करता है। वह परेशान है, नहर द्वारा किए गए अतिक्रमण की शिकायत किससे करे?
उत्तर प्रदेश सरकार ने ठियाबंदी प्रक्रिया को प्रभावी और नियत समय में करने के लिए राजस्व संहिता 2006 बनाई तथा राजस्व संहिता नियमावली 2016 में बनाई गई। 2020 में राजस्व संहिता नियमावली 2016 में तृतीय संशोधन कर नियम 22 को अधिक प्रभावी बनाया गया। नियम 22 के तीन महत्वपूर्ण उपनियम इस प्रकार हैं।
1. नियम 22(6) के अनुसार, “सीमांकन हेतु आवेदन प्राप्त किए जाने पर उसी दिन या अगले कार्य दिवस पर उपजिलाधिकारी राजस्व न्यायालय कम्प्यूटरीकृत प्रबंधन प्रणाली (RCCMS) पर वाद दर्ज करेगा।”
2. नियम 22(9) के अनुसार, “राजस्व निरीक्षक द्वारा सीमांकन उपजिलाधिकारी द्वारा तद्निमित्त कृत आदेश के दिनांक से एक माह के भीतर पूर्ण किया जाएगा।”
3. नियम 22(10) के अनुसार, “राजस्व निरीक्षक स्थल ज्ञाप सहित सीमांकन आख्या तैयार करेंगे और एक सप्ताह के भीतर तहसीलदार के माध्यम से उपजिलाधिकारी न्यायालय में प्रेषित करेंगे।”
इतना ही नहीं, राजस्व परिषद किसानों के हित की रक्षा के लिए दिसम्बर 2025 में एक शासनादेश लाई, जिसमें सीमांकन के समय की जियो-टैगिंग फोटोग्राफ लेने और बिना भौतिक सत्यापन के फाइल दफ्तर दाखिल करने वाले अधिकारी के विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई करने का स्पष्ट आदेश है।
इस सबके बावजूद उत्तर प्रदेश के किसानों का दुर्भाग्य है कि राजस्व कर्मियों एवं न्यायिक अधिकारियों द्वारा सबसे ज्यादा उल्लंघन नियम 22 के इन्हीं तीन उपनियमों का होता है। राजस्व न्यायालयों में समय से (RCCMS) पोर्टल पर वाद दायर नहीं होते हैं। समय से वाद दायर न होने के कारण राजस्व निरीक्षक वर्षों तक पैमाइश नहीं करते हैं। यदि दबाव में पैमाइश कर भी लें तो महीनों तक न्यायालय में आख्या नहीं सौंपते हैं। न्यायालय में आख्या सौंपने के बाद न्यायालय के सम्मन को धता बताते हुए न्यायालय में उपस्थित नहीं होते हैं। राजस्व संहिता 2006 की धारा 24(3) में ठियाबंदी की सम्पूर्ण प्रक्रिया तीन माह में पूरी करने का प्रावधान है। लेकिन हकीकत यह है कि वर्षों तक वाद निस्तारित नहीं होते हैं। जब तक राजस्व कर्मियों की जिम्मेदारी और जवाबदेही तय नहीं होगी, किसान यूं ही न्यायालयों के दरवाजों पर सिर पीटता रहेगा और नहर क्रुद्ध होकर किसी न किसी खेत पर कब्जा करती रहेगी तथा अधिकारी चैन की बंशी बजाते रहेंगे।