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रथयात्रा का महात्म

By ANJANI MISHRA • 2026-07-16 05:25 • 43 views   Share WhatsApp Share Facebook Share X
रथयात्रा का महात्म

जगन्नाथ रथ यात्रा हिंदू धर्म का एक अत्यंत पवित्र और ऐतिहासिक उत्सव है, जो हर साल ओडिशा के पुरी में आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाता है。यह यात्रा भाई-बहनों (भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा) के आपसी प्रेम, समानता और मोक्ष प्राप्ति का प्रतीक है

सार्वभौमिक समानता: मुख्य मंदिर में गैर-हिंदुओं का प्रवेश वर्जित है, लेकिन रथ यात्रा के दौरान भगवान स्वयं अपने भक्तों को दर्शन देने के लिए नगर भ्रमण पर निकलते हैं। इससे यह संदेश मिलता है कि ईश्वर के दरबार में कोई जाति या वर्ग का भेद नहीं है


गुंडीचा मंदिर की यात्रा: यह उत्सव भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा द्वारा अपनी मौसी के घर (गुंडीचा मंदिर) जाने की स्मृति में मनाया जाता है, जहाँ वे 9 दिनों तक विश्राम करते हैं。

छेरा पहेरा की रस्म: यात्रा शुरू होने से पहले पुरी के राजा सोने की झाड़ू से रथ के आगे का रास्ता साफ करते हैं। यह रस्म दर्शाती है कि भगवान की नजर में राजा और रंक दोनों एक समान


पारिवारिक प्रेम और आज्ञा का पालन: पौराणिक कथाओं के अनुसार, बहन सुभद्रा की नगर भ्रमण की इच्छा को पूरी करने के लिए तीनों भाई-बहन भव्य रथों पर सवार होकर निकले थे। यह यात्रा उसी प्रेम का प्रतीक है。

श्री कृष्ण की वृंदावन यात्रा (द्वापर युग): दूसरी मान्यता के अनुसार, यह यात्रा भगवान कृष्ण की अपने बचपन के धाम (वृंदावन) लौटने की याद दिलाती है。 जब कृष्ण द्वारका के राजा बन गए, तब कुरुक्षेत्र में एक सूर्य ग्रहण के दौरान वृंदावन की गोपियां उनसे मिलीं。 गोपियों ने प्रेमवश कृष्ण, बलभद्र और सुभद्रा के रथ से घोड़े हटाकर उसे स्वयं खींचना शुरू कर दिया。 गुंडिचा मंदिर को प्रतीकात्मक रूप से वृंदावन (या कृष्ण की मौसी का घर) माना जाता है。


इस यात्रा से जुड़े कुछ रहस्य और अद्भुत तथ्य:
अधूरी मूर्तियां: एक पौराणिक कथा के अनुसार, राजा इंद्रद्युम्न ने भगवान विष्णु के लिए मंदिर बनवाया。 मूर्तिकार (विश्वकर्मा जी) ने शर्त रखी कि जब तक वे मूर्ति बना रहे हैं, कोई दरवाजा नहीं खोलेगा。 लेकिन राजा से इंतजार नहीं हुआ और उन्होंने दरवाजा खोल दिया。 इससे भगवान की मूर्तियां अधूरी (बिना हाथ-पैरों के) ही रह गईं, जिन्हें आज भी पूजा जाता है。

हर साल नए रथ: इन विशाल रथों (जैसे जगन्नाथ जी का नंदीघोष, बलभद्र जी का तालध्वज) का निर्माण हर साल केवल नीम की लकड़ी से किया जाता है。 इन्हें बनाने में किसी भी लोहे की कील या धातु का उपयोग नहीं होता है。

आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष की द्वितीया को शुरू होने वाली यह रथ यात्रा 9 दिनों तक चलती है。 यात्रा के दौरान पुरी के 'बड़ा डांडा' (मुख्य मार्ग) पर लाखों श्रद्धालु खुद भगवान का रथ खींचकर पुण्य कमाते हैं

रिपोर्ट अंजनी मिश्रा

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