May 8, 2026

वाराणसी जिला न्यायालय परिसर को वर्तमान स्थान से किसी नये स्थान पर स्थानांतरण के संदर्भ में………

वाराणसी कचहरी परिसर (जिला न्यायालय परिसर 1913 से कार्यरत हैं।) को वर्तमान स्थान “जिला एवं सत्र न्यायालय, वाराणसी” से किसी नये स्थान पर स्थानांतरित करने की चर्चा पिछले कुछ वर्षों से समय-समय पर उठती रही है। इस विषय में न्यायपालिका, राज्य सरकार, प्रशासन तथा अधिवक्ताओं के संगठनों के बीच अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आए हैं। उपलब्ध सार्वजनिक सूचनाओं, समाचार रिपोर्टों तथा सामान्य प्रशासनिक तर्कों के आधार पर इस विषय का संकलित आलेख निम्न है:-

1. स्थानांतरण की पृष्ठभूमि : क्यों उठी यह मांग?:-
वर्तमान जिला न्यायालय वाराणसी शहर के अत्यंत व्यस्त क्षेत्र में स्थित है। वर्षों से निम्न समस्याएँ बताई जाती रही हैं—
• अत्यधिक भीड़ एवं यातायात जाम
•पार्किंग की गंभीर समस्या
•न्यायालय भवनों की सीमित क्षमता
•पुराने भवनों की संरचनात्मक चुनौतियाँ
•न्यायिक अधिकारियों, वादकारियों और अधिवक्ताओं के लिए पर्याप्त सुविधाओं का अभाव
•सुरक्षा संबंधी चिंताएँ

इलाहाबाद उच्च न्यायालय तथा राज्य प्रशासन की ओर से समय-समय पर यह विचार रखा गया कि शहर के बाहरी क्षेत्र में अधिक भूमि लेकर एक आधुनिक न्यायिक परिसर विकसित किया जाए, जहाँ—
•पर्याप्त कोर्ट रूम
•मल्टीलेवल पार्किंग
•रिकॉर्ड रूम
•अधिवक्ता चेंबर
•डिजिटल सुविधाएँ
•बेहतर सुरक्षा व्यवस्था
उपलब्ध हो सके।
ऐसा मॉडल लखनऊ, गौतम बुद्ध नगर आदि कई स्थानों पर नए न्यायालय परिसरों की योजना के संदर्भ में भी देखा गया है।

2. सरकार/प्रशासन की मंशा:-
राज्य सरकार और जिला प्रशासन की ओर से कथित रूप से यह तर्क दिया गया कि—
•वर्तमान कचहरी क्षेत्र शहर के मुख्य यातायात मार्गों पर दबाव बढ़ाता है।
•न्यायिक अवसंरचना विस्तार के लिए पर्याप्त भूमि नहीं है।
•भविष्य की न्यायिक आवश्यकताओं को देखते हुए बड़ा परिसर जरूरी है।
कभी-कभी उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा वैकल्पिक भूमि चिन्हांकन की चर्चाएँ भी स्थानीय स्तर पर सामने आईं।
हालाँकि, हर बार यह स्पष्ट नहीं हुआ कि अंतिम स्वीकृत योजना क्या है और नया स्थान कौन सा होगा। कई प्रस्ताव चर्चा स्तर से आगे नहीं बढ़ पाए।

3. अधिवक्ताओं का विरोध क्यों?:-
वाराणसी बार एसोसिएशन तथा अन्य अधिवक्ता संगठनों ने विभिन्न समयों पर इसका विरोध किया है। उनके प्रमुख तर्क—
(i) ऐतिहासिक महत्व
वर्तमान कचहरी परिसर वाराणसी की न्यायिक परंपरा का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है।
(ii) आम जनता की पहुँच
शहर के केंद्र में होने के कारण वादकारियों के लिए पहुँचना अपेक्षाकृत आसान है।
(iii) अधिवक्ताओं की आजीविका
वर्तमान परिसर के आसपास हजारों लोगों की आजीविका जुड़ी है—
•अधिवक्ता
•टाइपिस्ट
•स्टाम्प विक्रेता
•फोटोकॉपी दुकानें
•दस्तावेज लेखक
•छोटे व्यापारी
(iv) बिना परामर्श निर्णय का आरोप
अधिवक्ताओं का कहना रहा है कि उनसे पर्याप्त संवाद किए बिना निर्णय लेने की कोशिश हुई।
(v) चरणबद्ध विकास का विकल्प
कई अधिवक्ताओं ने कहा कि वर्तमान परिसर को ही आधुनिक बनाया जाए।

4. विरोध के तरीके:-
विभिन्न अवसरों पर अधिवक्ताओं द्वारा—
•धरना
•प्रदर्शन
•न्यायिक कार्य से विरत रहना
•ज्ञापन देना
•बार की आपात बैठक
जैसे कदम उठाए गए हैं।
दी बनारस बार एसोसिएशन जैसे संगठनों ने भी इस मुद्दे पर सक्रिय भूमिका निभाई है। वर्तमान में दी बनारस बार एसोसिएशन ने अपनी नयी मांग रखी है, बार के पदाधिकारियों का कहना है कि कचहरी के दक्षिण में बनारस क्लब है, उसको कहीं और स्थानांतरित कर, कचहरी परिसर को बनारस क्लब की भूमि पर विस्तारित किया जाए। वहीं दूसरी ओर दी सेन्ट्रल बार एसोसिएशन ‘बनारस’ वाराणसी के पदाधिकारियों ने मांग की है कि कचहरी परिसर को सेंट्रल जेल की भूमि पर स्थानांतरित कर दिया जाये। वर्तमान में बनारस बार एसोसिएशन ने दिनांक 07-05-2026 को बनारस क्लब के सामने धरना प्रदर्शन किया और आज दिनांक 08-05-2025 को बार भवन से जूलूस निकालकर अपनी मांग को दोहराया।

5. न्यायिक दृष्टिकोण:-
इलाहाबाद उच्च न्यायालय का प्राथमिक सरोकार सामान्यतः न्यायिक अवसंरचना सुधार होता है।
यदि किसी नए परिसर से बेहतर कार्यक्षमता संभव हो, तो न्यायपालिका उसका समर्थन कर सकती है। लेकिन व्यवहारिक क्रियान्वयन राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन पर निर्भर करता है।

6. वर्तमान स्थिति:-
उपलब्ध जानकारी के अनुसार यह विषय समय-समय पर पुनः उभरता है, लेकिन अधिवक्ताओं के तीव्र विरोध के कारण अभी तक कोई स्थायी एवं अंतिम स्थानांतरण व्यापक रूप से लागू नहीं हुआ है।
यदि भविष्य में कोई औपचारिक अधिसूचना, भूमि अधिग्रहण या निर्माण योजना आती है, तब स्थिति अधिक स्पष्ट होगी।

निष्कर्ष :: संपादक/रिपोर्ट के व्यक्तिगत विचार कुछ इस प्रकार से हैं:-
वाराणसी कचहरी स्थानांतरण विवाद केवल भवन परिवर्तन का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह
•न्यायिक अवसंरचना
•अधिवक्ताओं के हित
•आम जनता की सुविधा
•ऐतिहासिक पहचान
•शहरी विकास
इन सभी प्रश्नों से जुड़ा विषय है।
एक संतुलित समाधान यही हो सकता है, कि उत्तर प्रदेश सरकार, इलाहाबाद उच्च न्यायालय तथा वाराणसी बार एसोसिएशन आपसी संवाद से ऐसा मॉडल तैयार करें जिसमें न्यायिक सुविधाएँ भी बढ़ें और अधिवक्ताओं के हित भी सुरक्षित रहें (जैसे:- टिन शेड मुक्त परिसर हो, बार भवन हो, अधिवक्ता चेंबर्स/हाॅल हो, मीटिंग के लिए हाॅल हो, लाईब्रेरी हो, कैंटीन हो, अधिवक्ता पार्किंग अलग हो, आदि) तथा ईमानदारी के साथ सामान्य अधिवक्ताओं हर विषय, प्रत्येक मीटिंग की सूचना बार संघों की संयुक्त साधारण सभा में अथवा समाचार पत्रों, सोशल मीडिया, आदि के माध्यम से पारदर्शिता के साथ सूचित किया जाए। संवाद से ही समाधान संभव है, अहम् के द्वंद में किसी का लाभ नहीं है।
– आलेख द्वारा अंशुमान दुबे एडवोकेट/पत्रकार

Written by - Anshuman Dubey, Reporter/Advocate

ANSHUMAN DUBEY

District Reporter

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