— डॉ. महेश प्रसाद मिश्रा, भोपाल की कलम से 🚩
1 जनवरी—बलिदान का दिन: जब साधारण किसान ने अत्याचार के विरुद्ध संगठित होकर धर्म, संस्कृति और स्वाभिमान की रक्षा की

मथुरा–ब्रजभूमि के इतिहास में 1 जनवरी केवल कैलेंडर का पन्ना नहीं, बल्कि वीर गोकुला जाट के अमर बलिदान का स्मरण दिवस है। सन् 1670 में जब औरंगज़ेब ने ब्रज क्षेत्र के मंदिरों को ध्वस्त करने का आदेश दिया, तब किसी राजघराने या सेनानायक नहीं, बल्कि एक साधारण किसान—वीर गोकुला—ने अन्याय के विरुद्ध बिगुल फूंका।

धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए गोकुला ने आसपास के गाँवों के किसानों को संगठित किया। इस संघर्ष में गुज्जर, अहीर सहित विभिन्न समुदायों के लोग एकजुट हुए। यह लड़ाई किसी एक जाति की नहीं, बल्कि समूचे धर्म और सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा का साझा विद्रोह थी। बार-बार की मुठभेड़ों में शासकीय सेनाओं को पराजय मिली और ब्रजभूमि ने अपने रक्षक का शौर्य देखा।

अंततः तिलपत की लड़ाई में वीर गोकुला बंदी बनाए गए। आगरा की कोतवाली के सामने फव्वारा चौक पर 1 जनवरी 1670 को उन्हें जंजीरों से बांधकर अत्याचार का सामना करना पड़ा। धर्मांतरण के दबाव के बीच उनके निकटजनों पर क्रूरता ढाई गई, किंतु वीर गोकुला अडिग रहे। हर क्षण, हर पीड़ा के साथ उनसे अपने विश्वास से विमुख होने को कहा गया—परंतु वह योद्धा अंतिम सांस तक अटल रहा और धर्म व राष्ट्र की रक्षा के लिए सर्वस्व बलिदान कर गया।

इतिहास साक्षी है कि वीर गोकुला के जीवित रहते ब्रजभूमि के मंदिरों की ओर कोई आँख उठाने का साहस नहीं कर सका। उनका बलिदान हमें सिखाता है कि संगठित जनशक्ति, सत्य और साहस के सामने अत्याचार टिक नहीं पाता।

आज प्रश्न यह है—क्या हम केवल अंग्रेज़ी नववर्ष के उत्सव में डूबकर अपनी गुलामी की दास्तान को अनजाने में महिमामंडित कर रहे हैं? या फिर हम उन महान बलिदानियों को स्मरण करेंगे, जिन्होंने हमारे धर्म, संस्कृति और स्वाभिमान के लिए जीवन अर्पित किया?

यह समय है कि हम इतिहास को याद करें, अपने तुच्छ स्वार्थों से ऊपर उठें और अपने नायकों को नमन करें। 1 जनवरी को उत्सव नहीं, स्मरण और संकल्प का दिन बनाइए—ताकि आने वाली पीढ़ियाँ जानें कि इस धरती की रक्षा किन्होंने, कैसे और क्यों की।

 

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