(अख़बार की कटिंग उपयोगकर्ता द्वारा दिए गए सभी बिंदुओं के आधार पर)

जयपुर।भोपालI✍️ डॉ. महेश प्रसाद मिश्रा, भोपाल की कलम से

राजस्थान हाईकोर्ट के एक हालिया आदेश ने पूरे देश में तीखी बहस छेड़ दी है। अदालत ने कहा है कि यदि लड़का-लड़की बालिग होने की कगार पर हैं, पर विवाह-योग्य आयु नहीं पहुँची, तब भी वे अपनी मर्जी से ‘लिव-इन रिलेशन’ में रह सकते हैं—और किसी को इसमें हस्तक्षेप का अधिकार नहीं है।

जहाँ एक ओर केंद्र व राज्य सरकारें बाल-विवाह पर सख़्त प्रतिबंध को लेकर बड़े-बड़े अभियान चलाती हैं, वहीं दूसरी ओर न्यायालय का यह निर्णय समाज के सामने कई गंभीर सवाल खड़े कर देता है।

सामाजिक चिंताएँ और बनता हुआ गलत संदेश :कानून कहता है कि नाबालिग को सुरक्षा चाहिए, संरक्षण चाहिए…लेकिन यह फैसला नाबालिगों को ‘साथ रहने’ की खुली छूट देता है, जिससे परिवारों और समाज के बीच तीव्र असंतोष फैल रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि:

  • यह निर्णय किशोरों को गलत दिशा में प्रेरित कर सकता है।
  • स्कूल-कॉलेज आयु के बच्चे “अधिकार” के नाम पर बग़ावत की राह पकड़ सकते हैं।
  • इससे शोषण, गर्भधारण, भ्रूण-हत्या और परित्यक्त शिशुओं की घटनाएँ बढ़ सकती हैं।पहले ही देश-भर में झाड़ियों, नालों, कूड़े के ढेर और तालाबों में नवजात बच्चों के मिलने की घटनाएँ सामने आती रहती हैं। समाजशास्त्रियों का स्पष्ट कहना है कि लिव-इन का दुरुपयोग इन घटनाओं में एक बड़ी भूमिका निभाता है

भारतीय संस्कृति पर प्रत्यक्ष प्रहार: भारत की सभ्यता में विवाह-पूर्व सह-निवास का कोई स्थान नहीं रहा।
अब इसे “लिव-इन रिलेशन” नाम देकर वैश्यावृत्ति-समान व्यवहार को वैधता देने की कोशिश कही जा रही है।पश्चिमी देशों का हाल सभी के सामने है—न जाने कितने बच्चे ऐसे होते हैं जिन्हें यह तक नहीं पता कि उनके माता-पिता कौन हैं; नशा, अपराध और टूटे परिवार वहाँ की सामान्य तस्वीर बन चुके हैं।

क्या भारत भी उसी अंधेरे रास्ते पर चलने वाला है?सरकारों के लिए चेतावनी:

जब सरकारें बाल-विवाह रोकने के लिए कठोर कानून बना रही हैं,जब वे नाबालिगों की सुरक्षा और नैतिक मूल्यों की रक्षा की बात कर रही हैं,तो फिर—नाबालिगों के ‘लिव-इन’ को कानूनी संरक्षण देना एक दूसरे ही दिशा में जाने जैसा है।

समाज अब यह प्रश्न पूछ रहा है:क्या सरकारें और न्यायपालिका मिलकर देश को पश्चिमी बर्बादी के मॉडल की ओर धकेल रही हैं?यदि समय रहते इस प्रकार के निर्णयों पर पुनर्विचार नहीं हुआ तो
भारतीय संस्कृति, परिवार-संस्था और सामाजिक मर्यादाएँ टूट कर बिखर सकती हैं।

 “सरकार सावधान! नाबालिगों के लिव-इन को वैधता मिली तो भारत पश्चिमी गढ़्ढे में गिर जाएगा—परिवार, मर्यादा और संस्कृति सब खतरे में!”**

 

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