नाम धर्म का, धंधा सुविधा का: देश कब तक इस दोहरे चरित्र का बोझ ढोएगा?

 डॉ. महेश प्रसाद मिश्रा, भोपाल

सवाल सीधा है—जब बिना हिन्दू देवी-देवताओं के नाम के कई लोगों का काम नहीं चलता, तो फिर टकराव किस बात का है? सड़क किनारे लगा एक बोर्ड बहुत कुछ कह जाता है—माँ दुर्गा कार एंड बाइक सर्विस सेंटर”। नाम आस्था का, भरोसे का, और पहचान का है। पर बहस यहीं से शुरू होती है। अगर किसी विचारधारा के अनुसार देवी-देवताओं का नाम लेना “हराम” है, तो उन्हीं नामों पर कारोबार करना किस श्रेणी में आएगा—हराम या अचानक “हलाल”?

यही दोहरा मानदंड समाज को भीतर से खोखला कर रहा है। एक तरफ कुछ कथित फिरकापरस्त आस्था के नाम पर दूरी बनाते हैं, दूसरी तरफ उसी आस्था की पहचान को ब्रांड बनाकर रोज़गार और लाभ कमाते हैं। सवाल आस्था का अपमान नहीं, ईमानदारी का है—या तो विचार स्पष्ट हों, या व्यवहार।

 

इसी तरह का विरोधाभास आज जाति और पहचान की राजनीति में भी खुलकर दिखता है। कुछ तथाकथित अराजक तत्व दिन-रात सवर्ण समाज को गालियाँ देते नहीं थकते, पर अपने नाम के साथ उन्हीं सवर्ण उपनामों को लगाने की होड़ में रहते हैं। अगर इतनी ही नफ़रत है, तो नाम के साथ सिंह, शर्मा, पांडे, दीक्षित,

कश्यप, गौतम, रावत, नायक जैसे उपनाम क्यों?

और जब आरक्षण या सरकारी सुविधाओं की बात आती है, तो अचानक “असली जाति” याद आ जाती है।

यह चयनात्मक पहचान नहीं तो और क्या है?

आज सच पूछिए तो देश एक सामूहिक भ्रम में जी रहा है—चारों तरफ़ झूठ का आडंबर, सुविधा के हिसाब से बदली जाने वाली पहचान, और नैतिकता का लचीला पैमाना। धर्मांतरण का प्रश्न भी इसी श्रेणी में आता है। कई लोग नए धर्म अपनाने के बाद भी जब सुविधाओं और आरक्षण की बारी आती है, तो फिर से SC/ST/OBC की पहचान ओढ़ लेते हैं। यह गोरखधंधा अगर समय रहते नहीं रुका, तो अराजकता बढ़ना तय है—और फिर किसी एक समाज से संयम की अपेक्षा क्यों?

संविधान की बात हर दिन होती है, पर आम जनता पूछती है—असल संविधान है कहाँ? जिसे 293 लोगों ने मिलकर बनाया, उसमें समय-समय पर 200 से अधिक संशोधन हुए। सुधार ज़रूरी हैं, पर जब हर संशोधन सत्ता की सुविधा बन जाए, तो संविधान नहीं, नेताओं का विधान बनकर रह जाता है।

यह टिप्पणी किसी धर्म, जाति या समुदाय के विरुद्ध नहीं—यह उस दोहरे चरित्र के विरुद्ध है जिसने व्यवस्था को खोखला किया है। देश को आस्था से नहीं, ईमानदारी से जोड़ने की ज़रूरत है। वरना नाम बदलते रहेंगे, चेहरे बदलते रहेंगे, और सच हर बार सड़क किनारे लगे किसी बोर्ड की तरह हमें चुपचाप आईना दिखाता रहेगा।

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