विश्व डिजिटल मार्केटिंग दिवस 16 दिसंबर को मनाया जाता है। जिसकी शुरुआत 2018 में ‘डिजिटल मार्केटिंग प्रश्न और उत्तर’ नामक एक फेसबुक ग्रुप के सदस्यों ने की थी ताकि डिजिटल मार्केटिंग के बढ़ते महत्व और प्रभाव का जश्न मनाया जा सके। यह दिन ऑनलाइन मार्केटिंग के अवसरों, चुनौतियों और तकनीकों पर चर्चा करने का एक मंच प्रदान करता है। यह दिन डिजिटल मार्केटिंग के विभिन्न पहलुओं, जैसे SEO, सोशल मीडिया, कंटेंट मार्केटिंग और डेटा एनालिटिक्स पर केंद्रित होता है।
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अलग-अलग प्रकार के जल कूप होते हैं, कोई भी व्यक्ति, किसी विशेष प्रकार के जल कूपों का प्रयोग विशिष्ट प्रयोजन के लिए कर सकता है। पर यदि वह एक बहती नदी के समीप जाता है,तो उसकी सभी जल-संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति आसानी से हो जाती है। इसी प्रकार यदि हम कृष्णभावनामय हो जाते हैं, तो जीवन के सभी उद्देश्यों की पूर्ति के लिए अलग-अलग कूपों की आवश्यकता नहीं होगी, केवल कृष्णभावना की बहती नदी ही पर्याप्त होगी।

(श्रील प्रभुपाद लॉस ऐन्जिलिस, 16 दिसम्बर 1968 )
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इस्कॉन® कुलाई, मैंगलोर,की ओर से एकादशी के दिन भगवद गीता का एक विशेष श्लोक पाठ होता है, जिसमें सभी 18 अध्यायों के 700 श्लोक शामिल हैं ।

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विभिन्न श्रेणियों के पाठ का समय इस प्रकार है👇

*वयस्कों के लिए श्लोक पाठ*
समय: सुबह 10:00 बजे से दोपहर 1:00 बजे तक IST
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मीटिंग ID: 4940263157
पासकोड: 108

*बच्चों के लिए श्लोक पाठ*
समय: शाम 4:30 बजे से शाम 7:30 बजे तक IST
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*युवाओं के लिए श्लोक पाठ*
समय: शाम 7 बजे से रात 10 बजे तक IST
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मीटिंग ID: 510 227 9099
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क्या आपको पता है अर्जुन से भी पहले भगवत गीता का ज्ञान करोडो वर्ष पहले सूर्य देव को दिया गया था? “संदर्भ: भगवद् गीता 4.1- 4.3 👇

भगवद गीता यथारूप – गुरु-परम्परा 👇

Bhagavad Gita 4.1 👇

परम भगवान श्रीकृष्ण ने कहा-मैने इस शाश्वत ज्ञानयोग का उपदेश सूर्यदेव, विवस्वान् को दिया और विवस्वान् ने मनु और फिर इसके बाद मनु ने इसका उपदेश इक्ष्वाकु को दिया।

Bhagavad Gita 4.2 👇

हे शत्रुओं के दमन कर्ता! इस प्रकार राजर्षियों ने सतत गुरु परम्परा पद्धति द्वारा ज्ञान योग की विद्या प्राप्त की किन्तु अनन्त युगों के साथ यह विज्ञान संसार से लुप्त हो गया प्रतीत होता है।

Bhagavad Gita 4.3 👇

उसी प्राचीन गूढ़ योगज्ञान को आज मैं तुम्हारे सम्मुख प्रकट कर रहा हूँ क्योंकि तुम मेरे मित्र एवं मेरे भक्त हो इसलिए तुम इस दिव्य ज्ञान को समझ सकते हो।

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एवं परम्पराप्राप्तम् इमं राजर्षयो विदुः (भगवद्गीता ४.२) | यह भगवद्गीता यथारूप इस गुरु-परम्परा द्वारा प्राप्त हुई है –
१. श्रीकृष्ण ,२. ब्रह्मा ,३. नारद , ४. व्यास ५. मध्व,६. पद्मनाभ ,७. नृहरि ,८. माधव
९. अक्षोभ्य,१०.जयतीर्थ , ११.ज्ञानसिन्धु , १२.दयानिधि ,१३.विद्यानिधि , १४.राजेन्द्र
१५.जयधर्म ,१६.पुरुषोत्तम , १७.ब्रह्मण्यतीर्थ १८. व्यासतीर्थ,१९.लक्ष्मीपति,२०.माधवेन्द्रपुरी
२१.ईश्र्वरपुरी (नित्यानन्द, अद्वैत),२२.श्रीचैतन्य महाप्रभु
२३.रूप(स्वरूप, सनातन),२४.रघुनाथ, जीव
२५.कृष्णदास,२६.नरोत्तम,२७.विश्र्वनाथ, २८.(बलदेव) जगन्नाथ,२९.भक्तिविनोद,३०.गौरकिशोर
३१.भक्तिसिद्धान्त सरस्वती,३२.ए. सी. भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद और अब उनके शिष्यों के माध्यम से हम तक।

इस्कॉन के संस्थापक ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद हैं, जिन्होंने 1966 में न्यूयॉर्क शहर में अंतर्राष्ट्रीय कृष्ण भावनामृत संघ (इस्कॉन) की स्थापना की थी।

ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद और हमारी गुरुपरंपरा की जय हो। रथ सप्तमी जिसे सूर्य देव के जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है ,उसी रथ सप्तमी के दिन से मैंने भागवत गीता गुरु परम्परा से (Level -1 ) ,इस्कॉन ®,कुलाई, मंगलोर द्वारा पढ़ना शुरू किया था।
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हरे कृष्ण इस्कॉन® कुलाई, मैंगलोर,की ओर से मंगल आरती सुबह @ 4:30 बजे प्रतिदिन , महामंत्र जप सत्र सुबह @ 5:00 बजे प्रतिदिन ,दर्शन आरती ,गुरु पूजा प्रातः@ 7:10 बजे प्रतिदिन, भागवतम् क्लास संध्या काल@7:30 बजे प्रतिदिन, ऑनलाइन ज़ूम लिंक के माध्यम से शामिल हो।

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मंगलाचरण 👇

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय,ॐ नमो भगवते वासुदेवाय,ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

1) ॐ अज्ञान तिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जलाकया ।
चक्षुरुन्मिलितं येन तस्मै श्रीगुरुवे नम: ।।
श्री चैतन्यमनोऽभीष्टं स्थापितं येन भूतले ।
स्वयं रूप: कदा मह्यंददाति स्वपदान्न्तिकम् ।।

2) वन्देऽहं श्रीगुरो: श्रीयुतपदकमलं श्रीगुरुन् वैष्णवांचश्र ।
श्रीरूपं साग्रजातं सहगणरघुनाथनविथं तं सजीवम् ।।
सद्वैतं सावधूतं परिजनहितं कृष्णचैतन्यदेवं ।
श्रीराधाकृष्णपादान सहगणललिताश्रीविशाखानन्विताशार्च ।।

3) हे कृष्ण करुणासिन्धो दीनबन्धो जगत्पते ।
गोपेश गोपिकाकान्त राधाकान्त नमोऽस्तु ते।।

तप्तकाञ्चनगौरंगी राधे वृंदावनेश्वरी।
वृषभानुसुते देवि प्रणमामि हरिप्रिये।

4) वाञ्छाकल्पतरुभ्यश्र्च कृपासिंधुभय एव च।
पतितानां पावनेभ्यो वैष्णवेभ्यो नमो नामः ।।

जय श्रीकृष्ण-चैतन्य प्रभु नित्यानन्द।
श्रीअद्वैत गदाधर श्रीवासादि गौरभक्तवृन्द।।

5) नम ॐ विष्णु-पादाय कृष्ण-प्रेष्ठाय भूतले
श्रीमते भक्तिवेदांत-स्वामिन् इति नामिने ।

नमस्ते सारस्वते देवे गौर-वाणी-प्रचारिणे
निर्विशेष-शून्यवादि-पाश्चात्य-देश-तारिणे ॥

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।।
*****

*तुलसी प्रणाम मंत्र*

वृन्दायै तुलसी देवयायै प्रियायै केशवस्य च।
कृष्णभक्ति प्रद देवी सत्यवत्यै नमो नमः॥
*****

*वैष्णव प्रणाम मंत्र*
वाञ्छाकल्पतरुभ्यश्र्च कृपासिंधुभय एव च।
पतितानां पावनेभ्यो वैष्णवेभ्यो नमो नामः ।।
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👉 इस्कॉन® कुलाई, मैंगलोर,की ओर से भगवद् गीता Level-2 बैच (Hindi ) Online Class यूट्यूब रिकॉर्डिंग लिंक –

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Bhagavad Gita Verse Of the Day:Chapter 9 Verse 4👇

मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमुर्तिना |
मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः || ४ ||

मया – मेरे द्वारा; ततम् – व्याप्त है; इदम् – यह; सर्वम् – समस्त; जगत् – दृश्य जगत; अव्यक्त-मूर्तिना – अव्यक्त रूप द्वारा; मत्-स्थानि – मुझमें; सर्व-भूतानि – समस्त जीव; न – नहीं; च – भी; अहम् – मैं; तेषु – उनमें; अवस्थितः – स्थित |

Translation👇

यह सम्पूर्ण जगत् मेरे अव्यक्त रूप द्वारा व्याप्त है | समस्त जीव मुझमें हैं, किन्तु मैं उनमें नहीं हूँ |

Commentary👇

भगवान् की अनुभूति स्थूल इन्द्रियों से नहीं हो पाती |
कहा गया है कि –

अतः श्रीकृष्णनामादि न भवेद् ग्राह्यमिन्द्रियैः |
सेवोन्मुखे हि जिह्वादौ स्वयमेव स्फुरत्यदः ||
(भक्तिरसामृत सिन्धु १.२.२३४)

भगवान् श्रीकृष्ण के नाम, यश, लीलाओं आदि को भौतिक इन्द्रियों से नहीं समझा जा सकता | जो समुचित निर्देशन से भक्ति में लगा रहता है उसे ही भगवान् का साक्षात्कार हो पाता है | ब्रह्मसंहिता में (५.३८) कहा गया है – प्रेमाञ्जनच्छुरितभक्तिविलोचनेन सन्तः सदैव हृदयेषु विलोकयन्ति – यदि किसी ने भगवान् के प्रति दिव्य प्रेमाभिरूचि उत्पन्न कर ली है, तो वह सदैव अपने भीतर तथा बाहर भगवान् गोविन्द को देख सकता है | इस प्रकार वे सामान्यजनों के लिए दृश्य नहीं हैं | यहाँ पर कहा गया है कि यद्यपि भगवान् सर्वव्यापी हैं और सर्वत्र उपस्थित रहते हैं, किन्तु वे भौतिक इन्द्रियों द्वारा अनुभवगम्य नहीं हैं | इसका संकेत अव्यक्तमुर्तिना शब्द द्वारा हुआ है | भले ही हम उन्हें न देख सकें, किन्तु वास्तविकता तो यह है कि उन्हीं पर सब कुछ आश्रित है | जैसा कि सातवें अध्याय में बताया जा चुका है कि सम्पूर्ण दृश्य जगत् उनकी दो विभिन्न शक्तियों – पता या आध्यात्मिक शक्ति तथा अपरा या भौतिक शक्ति – का संयोग मात्र है | जिस प्रकार सूर्यप्रकाश सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में फैला रहता है उसी प्रकार भगवान् की शक्ति सम्पूर्ण सृष्टि में फैली है और सारी वस्तुएँ उसी शक्ति पर टिकी हैं |

फिर भी किसी को इस निष्कर्ष पर नहीं पहुँचना चाहिए कि सर्वत्र फैले रहने के कारण भगवान् ने अपनी व्यक्तिगत सत्ता खो दी है | ऐसे तर्क का निराकरण करने के लिए भगवान् कहते हैं ”मैं सर्वत्र हूँ और प्रत्येक वस्तु मुझमें है तो भी मैं पृथक् हूँ |” उदाहरणार्थ, राजा किसी सरकार का अध्यक्ष होता है और सरकार उसकी स्जक्ति का प्राकट्य होती है, विभिन्न सरकारी विभाग राजा की शक्ति के अतिरिक्त और कुछ नहीं होते और प्रत्येक विभाग राजा की क्षमता पर निर्भर करता है | तो भी राजा से यह आशा नहीं की जाती कि वह प्रत्येक विभाग में स्वयं उपस्थित हो | यह एक मोटा सा उदाहरण दिया गया | इसी प्रकार हम जितने स्वरूप देखते हैं और जितनी भी वस्तुएँ इस लोक में तथा परलोक में विद्यमान हैं वे सब भगवान् की शक्ति पर आश्रित हैं | सृष्टि की उत्पत्ति भगवान् की विभिन्न शक्तियों के विस्तार से होती है और जैसा कि भगवद्गीता में कहा गया है – विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नम् – वे अपने साकार रूप के करण अपनी विभिन्न शक्तियों के विस्तार से सर्वत्र विद्यमान हैं |
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पवित्रता ही दिव्यता की जननी है। ईश्वर सभी ऊर्जाओं में सबसे पवित्र है। ईश्वर के संपर्क में रहने के लिए हमें अपने स्पंदनों को बढ़ाना होगा और अंततः स्वच्छ और शुद्ध होना होगा। हमारी पवित्रता और सरलता का स्तर ही सर्वोच्च के साथ हमारी निकटता तय करता है।

कलि-काले नाम-रूपे कृष्ण-अवतार । नाम हैते हय सर्व-जगत्निस्तार ।।

इस कलियुग में भगवान् के पवित्र नाम अर्थात् हरे कृष्ण महामंत्र भगवान् कृष्ण का अवतार है। केवल पवित्र नाम के कीर्तन से मनुष्य भगवान् की प्रत्यक्ष संगति कर सकता है। जो कोई भी ऐसा करता है, उसका निश्चित रूप से उद्धार हो जाता है।

महामंत्र 💫👉हरे कृष्ण हरे कृष्ण , कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम , राम राम हरे हरे।।
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thanks & regards !

Jeetendra Sharan
(ICTRD Certified Digital Marketing Expert )

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