✍️ डॉ. महेश प्रसाद मिश्रा, भोपाल की कलम से

 भारत की संवैधानिक व्यवस्था पर आज एक बड़ा और असहज प्रश्न खड़ा हो गया है।क्या यही न्याय है कि रेल में बिना टिकट पकड़ा गया सामान्य नागरिक तुरंत दंडित हो,लेकिन हजारों–करोड़ों के घोटाले करने वाले नेता वर्षों तक जमानत पर ऐश करें,चुनाव लड़ें, जीतें और सत्ता के शिखर तक पहुँच जाएँ?

देश ने यह दृश्य कई बार देखा है —जहाँ छोटी रिश्वत लेने पर कर्मचारी की नौकरी चली जाती है,
किसी छात्र का भविष्य हमेशा के लिए बर्बाद हो जाता है,लेकिन भ्रष्टाचार के बड़े आरोपी जेल से बाहर बैठकर नैतिकता पर भाषण देते हैं

यह भी एक कटु सत्य है कि आज भारत में कोई व्यक्ति जेल में रहते हुए भी चुनाव लड़ सकता है,
और यदि बाहुबल व जातीय गणित से जीत गया,तो मंत्री पद तक संभाल सकता है। यही वह विरोधाभास है, जो आम नागरिक को यह सोचने पर मजबूर करता है —क्या यही न्याय है?”

मनुस्मृति को कोसने वालों के लिए ग्रंथीय तथ्य:

 आज कुछ समूह मनुस्मृति को गाली देने को फैशन बना चुके हैं,लेकिन वे यह नहीं बताते कि
दुराचार, बलात्कार, चोरी और छल परउस ग्रंथ में कितना कठोर दंड वर्णित है।

नाबालिग का जादू: अपराध बालक का, क्रूरता राक्षस की! हमारे भारतीय संविधान के हिसाब से:-

वाह रे व्यवस्था! जो हाथ निर्दयता से बलात्कार कर सकते हैं,जो दिमाग ठंडेपन से हत्या की योजना बना सकता है,वह अचानक जन्मतिथि के काग़ज़ में नाबालिग हो जाता है!

कानून कहता है—“दया करो, बच्चा है।”समाज पूछता है—“तो फिर यह क्रूरता किस उम्र की होती है?”

और कमाल देखिए— कभी-कभी वही अपराध राजनीतिक रंग में डुबो दिया जाता है, जातीय चश्मा पहनाकर देखा जाता है, और अपराधी पीड़िता नहीं, पोस्टर का विषय बन जाता है।

कहीं महिमामंडन, कहीं प्रोत्साहन राशि, और कहीं तालियों की खामोश गूंज। यह कैसा न्याय है जहाँ निर्दोष की उम्र नहीं, पर अपराधी की उम्र सबसे बड़ा तर्क बन जाती है? जहाँ पीड़िता की ज़िंदगी एक खबर बनकर रह जाती है, और अपराधी का भविष्य योजनाओं में सुरक्षित कर लिया जाता है? अगर कानून की किताब में जन्मतिथि अपराध से बड़ी हो जाए, तो फिर न्याय तराज़ू नहीं, कैलेंडर से तौला जाएगा।

व्यंग्य नहीं, सवाल है— क्रूरता की कोई उम्र नहीं होती, तो दंड की उम्र क्यों?

 

मनुस्मृति को कोसने वालों के लिए ग्रंथीय तथ्य:

📖 मनुस्मृति – अष्टम अध्याय (न्याय-दंड)

1) बलात्कार / बलपूर्वक संबंध

मनुस्मृति 8.359 (प्रचलित पाठ)

बलात्संगं तु यो कुर्यात् स्त्रीषु ब्रह्मस्वपि द्विजः

सर्वस्वहरो दण्ड्यः शारीरश्चापि निग्रहः

जो स्त्री से बलपूर्वक संबंध बनाए—चाहे वह ब्राह्मण ही क्यों हो—उसकी संपत्ति जब्त हो और कठोर शारीरिक दंड दिया जाए।

मनुस्मृति 8.360

परदाराभिगमने सर्वस्वं दण्ड एव

स्त्रीग्रहणबलात्कारात् प्राणान्तोऽपि विधीयते

परस्त्री के साथ जबरन संबंध परसंपूर्ण धनहरण और अत्यंत गंभीर मामलों में प्राणदंड तक

2) विवाहित/संरक्षित स्त्री के साथ अपराध

मनुस्मृति 8.364

रक्षितां तु स्त्रियम् हृत्वा बलाद् वा योऽभिगच्छति । स सर्वस्वहरो दण्ड्यः प्राणैश्चापि वियुज्यते

भावार्थ:
संरक्षित (विवाहित/आश्रित) स्त्री के साथ बल या अपहरण द्वारा अपराध— संपूर्ण संपत्ति जब्ती और मृत्युदंड

 3) छल/प्रलोभन से दुराचार

मनुस्मृति 8.362

छलेन वा प्रसादेन गुप्तं वा यः समाचरेत्

दण्ड्यः सर्वथा ज्ञेयः शतशो दण्डमर्हति

छल, प्रलोभन या गुप्त तरीके से दुराचार—कठोर दंड का पात्र।

 4) चोरी

मनुस्मृति 8.332–334 (सार)

चोरी पर धनहरण,अपराध की पुनरावृत्ति पर कठोर शारीरिक दंड—और दंड में पद/जाति बाधा नहीं

 

आज का असहज सवाल

जब प्राचीन ग्रंथों में भी संदेश स्पष्ट था—

👉 अपराध पर दंड त्वरित और कठोर,

👉 अपराधी की पहचान अप्रासंगिक,

तो आधुनिक व्यवस्था में बड़े अपराधियों के लिए नरमी और छोटे आदमी के लिए सख़्ती क्यों? यह बहस ग्रंथ बनाम संविधान की नहीं, दोहरे मापदंड बनाम समान न्याय की है।

यदि कानून का डर सिर्फ आम आदमी के लिए रहेगा, तो लोकतंत्र काग़ज़ पर न्याय और
मैदान में अन्याय बनकर रह जाएगा।

 निष्कर्ष  यह निकलता है की देश को हिंसा नहीं, समान कानून चाहिए; भीड़ नहीं, निष्पक्ष न्याय चाहिए; और सबसे बढ़कर— अपराध छोटा हो या बड़ा, दंड एक-सा चाहिए।

इसलिए समाज में अम्बेडकरवाद के रूप में फ़ैल रहा एक तरह के आतंकवाद पर सरकारों को लगाम लगन होगा, क्यूंकि ये तथाकथित अम्बेडकरवादी आज समाज में जहर घोल रहे हैं, किसी भी पौराणिक ग्रन्थ को जलाना सर्वथा दंडनीय है, अगर यही काम दूसरे समाज करने लगे और अम्बेडकर द्वारा लिखी किताबें जलने लग जाएँ तो देश में सिर्फ और सिर्फ अराजकता फैलेगी इसके आलावा कुछ नहीं , अब वक्त है सरकारों को चेताने का और ऐसे समाज के गद्दारों को सबक सीखाने का I

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