भारत. विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र। यहाँ हर नागरिक का वोट एक सपना बुनता है, एक उम्मीद जगाता है। और इस लोकतंत्र का दिल है हमारी संसद। वह पवित्र मंदिर, जहाँ जनता के चुने हुए प्रतिनिधि हमारी आवाज़ को सरकार तक पहुँचाते हैं। लेकिन सवाल यह है—क्या वाकई में संसद में जनता की आवाज़ गूँज रही है? या यह सिर्फ़ सियासत का अखाड़ा बनकर रह गया है?

भारत की संसद सिर्फ़ एक इमारत नहीं, बल्कि हमारे लोकतंत्र की आत्मा है। यह वह जगह है, जहाँ 1947 में आज़ादी के बाद हमारे संविधान निर्माताओं ने एक समृद्ध और समावेशी भारत का सपना देखा था। डॉ. बी.आर. आंबेडकर, सरदार पटेल, और पंडित नेहरू जैसे दिग्गजों ने इस संसद को जनता की आवाज़ का प्रतीक बनाया। लेकिन आज, क्या वह सपना वास्तविकता में जीवित है?

जब हम आज के संसद सत्रों को देखते हैं, तो एक निराशाजनक तस्वीर उभरती है। हंगामा, नखरेबाजी, और कार्यवाही का बार-बार स्थगन। सांसद अपनी-अपनी पार्टियों की मार्केटिंग में व्यस्त दिखते हैं। एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप, पुरानी गलतियों का हिसाब-किताब, और कभी-कभी तो शेर-ओ-शायरी का दौर। लेकिन इन सबके बीच जनता के असली मुद्दे—बेरोज़गारी, गरीबी, शिक्षा, स्वास्थ्य, और महंगाई—कहीं खो से जाते हैं। क्या इसके लिए हम अपने सांसदों को चुनते हैं? क्या हमारा वोट इस सियासी नाटक के लिए है?

भारत की जनता हर दिन अनगिनत चुनौतियों का सामना करती है। खेतों में पसीना बहाने वाला किसान, जिसे अपनी फसल का सही दाम नहीं मिलता। शहरों में रोज़गार की तलाश में भटकता युवा, जिसके सपने बेरोज़गारी की दीवार से टकराते हैं। और वह मध्यम वर्गीय परिवार, जो बच्चों की स्कूल फीस और अस्पताल के बिलों के बोझ तले दबा है। ये लोग अपने नेताओं पर भरोसा करते हैं। वे उम्मीद करते हैं कि उनके चुने हुए सांसद संसद में उनकी बात रखेंगे। लेकिन जब संसद में हंगामा होता है, तो यह भरोसा टूटता है।

आँकड़े झकझोर देने वाले हैं। हाल के वर्षों में संसद के कई सत्रों में कार्यवाही के घंटे हंगामे की भेंट चढ़ गए। महत्वपूर्ण बिल लटके रहे, जनता के मुद्दों पर चर्चा नहीं हुई। सत्र शुरू होते हैं, और कुछ ही घंटों में हंगामे के कारण बंद हो जाते हैं। हर साल करोड़ों रुपये जनता के टैक्स से संसद चलाने में खर्च होते हैं, लेकिन बदले में हमें क्या मिलता है? स्थगित सत्र और अनसुलझी समस्याएँ।

चुनाव का मौसम आता है, तो सियासत का रंग बदल जाता है। बड़े-बड़े वादे, नए नारे, और चमचमाते प्रचार। विकास, रोज़गार, शिक्षा, और समृद्धि की बातें। लेकिन ये वादे अक्सर सिर्फ़ वोट जुटाने का ज़रिया बनकर रह जाते हैं। और सबसे दुखद बात? यह सब जनता के टैक्स के पैसों से होता है। वह पैसा, जो स्कूलों, अस्पतालों, और सड़कों के लिए इस्तेमाल होना चाहिए, सियासी प्रचार में खर्च हो जाता है। चुनाव खत्म होते ही वादे भुला दिए जाते हैं, और जनता फिर से अपनी समस्याओं के साथ अकेली रह जाती है।

भारत की जनता ने हमेशा से बदलाव की ताकत दिखाई है। आज़ादी की लड़ाई हो या आपातकाल के खिलाफ आंदोलन, जब जनता एकजुट हुई, तो इतिहास बदला। लेकिन आज हमें फिर से उस ताकत को जगाने की ज़रूरत है। हमें यह समझना होगा कि ऐसी राजनीति, जो सिर्फ़ सत्ता और स्वार्थ के लिए चल रही है, हमारे देश का भला नहीं कर सकती।

आज का भारत बदल रहा है। युवा जागरूक हो रहे हैं। सोशल मीडिया पर जनता अपनी बात बुलंद कर रही है। मतदान केंद्रों पर लंबी कतारें बता रही हैं कि लोग अपने वोट की ताकत समझ रहे हैं। लेकिन सिर्फ़ वोट देना काफी नहीं। हमें सही नेताओं को चुनना होगा। हमें उनकी जवाबदेही तय करनी होगी। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि संसद में हमारी समस्याओं पर चर्चा हो, न कि सियासी ड्रामे।

हमें जाति, धर्म, और अन्य भटकाने वाले मुद्दों से ऊपर उठना होगा। हमें यह देखना होगा कि कौन सा नेता, कौन सी पार्टी हमारी ज़रूरतों को समझती है। हमें अपने हक़ के लिए लड़ना होगा। अगर हम चुप रहे, तो सियासत हमें इस्तेमाल करती रहेगी। हमारी आने वाली पीढ़ियाँ भी इसकी कीमत चुकाएँगी। लेकिन अगर हम आज एकजुट हो गए, तो हम एक ऐसा भारत बना सकते हैं, जहाँ हर नागरिक की आवाज़ सुनी जाए।

यह असंभव नहीं है। संसद में कई बार सार्थक चर्चाएँ भी हुई हैं। महत्वपूर्ण बिल पास हुए हैं, नीतियाँ बनी हैं। लेकिन यह तभी होता है, जब सांसद अपनी ज़िम्मेदारी समझते हैं। हमें ऐसी संसद चाहिए, जो जनता के मुद्दों पर केंद्रित हो। हमें ऐसे सांसद चाहिए, जो सियासत से ऊपर उठकर देश की प्रगति के लिए काम करें।

भारत का भविष्य हमारी, यानी जनता की, जागरूकता पर टिका है। संसद में हमारी आवाज़ तभी गूँजेगी, जब हम एकजुट होकर अपनी बात रखेंगे। यह समय है बदलाव का। यह समय है एक नए भारत का, जहाँ संसद सियासत का अखाड़ा नहीं, बल्कि जनता की उम्मीदों का मंच हो। आइए, हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि हम अपने देश को ऐसी राजनीति से बचाएँगे, जो सिर्फ़ सत्ता के लिए काम करती है। हम अपने बच्चों के लिए एक ऐसा भारत बनाएँगे, जहाँ हर सपना साकार हो, और हर आवाज़ सुनी जाए।

 

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Editor in Chief Headlines92 Media Network, Certified Investigative Journalist. Writer, Thinker. Analyst.

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