23 जून , 2026 रिपोर्ट – गौरव सिंह
कांगड़ा – पालमपुर
पालमपुर के पास स्थित चामुंडा देवी मंदिर (चामुंडा नंदिकेश्वर धाम) लगभग 400 से 450 साल पुराना एक सिद्ध शक्तिपीठ है। यह मंदिर बनेर खड्ड नदी के तट पर स्थित है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, माँ दुर्गा (देवी कौशिकी) ने यहीं पर चंड और मुंड नामक असुरों का वध किया था, जिसके बाद उन्हें ‘चामुंडा’ नाम प्राप्त हुआ।पौराणिक महत्व –
दानव वध: देवी महात्म्य के अनुसार, जब देवताओं और राक्षसों के बीच भीषण युद्ध हो रहा था, तब देवी कौशिकी ने अपने ललाट से काली का रूप धारण किया। इसी रूप में उन्होंने चंड और मुंड का वध किया, जिसके बाद माँ को ‘चामुंडा’ पुकारा गया।
रुद्र चामुंडा: एक अन्य कथा के अनुसार, भगवान शिव और असुर जालंधर के बीच हुए युद्ध में माता चामुंडा को ‘रुद्र’ की उपाधि मिली, इसलिए इसे ‘रुद्र चामुंडा’ भी कहा जाता है।ऐतिहासिक पृष्ठभूमि स्थानांतरण की कथा:
लगभग 400 से 450 वर्ष पूर्व, कटोच वंश के राजा और एक पुजारी ने माता की प्रतिमा को एक सुलभ स्थान पर स्थापित करने की प्रार्थना की। देवी ने पुजारी को स्वप्न में आकर प्रतिमा के मिलने का स्थान बताया। इसके बाद प्रतिमा को वहां से निकालकर वर्तमान स्थान (बनेर खड्ड के किनारे) पर स्थापित किया गया।
शिव और शक्ति का मिलन: मुख्य गर्भगृह में देवी की मूर्ति के साथ-साथ भगवान शिव (नंदिकेश्वर) की भी पूजा होती है। यहाँ भगवान शिव को देवी के साथ एक गुफा में मृत्युंजय के रूप में पूजा जाता है।मंदिर की वर्तमान स्थिति और मान्यताएं इस पवित्र धाम में रोज़ाना ‘शत चंडी’ का पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है।मंदिर में देवी के छोटे-छोटे पदचिह्न भी अंकित हैं जो भक्तों के आकर्षण का केंद्र हैं।यह पालमपुर से लगभग 10-12 किलोमीटर की दूरी पर बसा एक प्रमुख धार्मिक और पर्यटन स्थल है।