वसुधैव कुटुंबकम् का सजीव रूप: जब जर्मन नागरिक की कलाई पर सजा भारतीय रक्षा सूत्र,
बोधगया में जर्मनी के पर्यटक माइकल ने मनाया रक्षाबंधन, भारतीय संस्कृति और आत्मीयता का अनुभव
बोधगया: भौगोलिक सीमाओं और सांस्कृतिक विविधताओं से परे लोगों को जोड़ने वाली भारतीय परंपराओं की एक झलक अंतर्राष्ट्रीय ज्ञान स्थली बोधगया में देखने को मिली। जर्मनी से भारत भ्रमण पर आए विदेशी नागरिक माइकल ने कल्याण परिवार की बहनों के साथ रक्षाबंधन का पर्व मनाया और पूरे विधि-विधान से अपनी कलाई पर राखी बंधवाई।
यह अवसर केवल एक पर्व मनाने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि भारतीय पारिवारिक परंपराओं और ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भावना की एक झलक भी सामने आई।
रक्षाबंधन के अनुभव से प्रभावित हुए माइकल
राखी बंधवाने के बाद माइकल ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि जर्मनी या पश्चिमी देशों में इस प्रकार के पारिवारिक और भावनात्मक रिश्तों को समर्पित पर्वों का स्वरूप अलग है। उन्होंने बोधगया में रक्षाबंधन के दौरान भाई-बहन के स्नेह और पारिवारिक भावनाओं को करीब से अनुभव करने को अपने लिए एक विशेष अनुभव बताया।
रक्षाबंधन जैसे पर्व भारतीय समाज में पारिवारिक संबंधों, स्नेह और आपसी विश्वास को अभिव्यक्त करने का अवसर प्रदान करते हैं। ऐसे सांस्कृतिक अनुभव विदेशी पर्यटकों को भारत की विविध परंपराओं को करीब से समझने का अवसर भी देते हैं।
भारतीय संस्कृति की वैश्विक पहचान
भारत की सांस्कृतिक विरासत और परंपराएं देश की वैश्विक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। जब विदेशी पर्यटक भारतीय त्योहारों और परंपराओं में भाग लेते हैं, तो उन्हें स्थानीय संस्कृति, पारिवारिक मूल्यों और सामाजिक परंपराओं को प्रत्यक्ष रूप से समझने का अवसर मिलता है।
बोधगया के कल्याण परिवार और मुरारी सिंह चंद्रवंशी की ओर से आयोजित यह पहल ‘अतिथि देवो भव:’ की भारतीय भावना से जुड़ी सांस्कृतिक आत्मीयता को दर्शाती है।
रक्षाबंधन ने दिया भाईचारे का संदेश
रक्षाबंधन का पर्व भाई-बहन के स्नेह और आपसी विश्वास का प्रतीक माना जाता है। बोधगया में माइकल के राखी बंधवाने का यह अवसर विभिन्न देशों और संस्कृतियों के लोगों के बीच संवाद एवं आपसी समझ का संदेश भी देता है।
इस तरह के सांस्कृतिक अनुभव भारत आने वाले विदेशी पर्यटकों के लिए यादगार बन सकते हैं और उन्हें भारतीय परंपराओं को नजदीक से जानने का अवसर प्रदान करते हैं।