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खलनायिका और कठोर सास की भूमिका निभाने वाली ललिता पवार*

By DHIMAN KUMAR SHAH • 2026-10-14 10:23 • 5 views   Share WhatsApp Share Facebook Share X
खलनायिका और कठोर सास की भूमिका निभाने वाली ललिता पवार*

खलनायिका और कठोर सास की भूमिका निभाने वाली ललिता पवार*

*धीमन शाह*

अपने बहुमुखी अभिनय से पचास वर्षों से अधिक समय तक रुपहले पर्दे पर राज करने वाली अभिनेत्री थीं ललिता पवार। उनका असली नाम अंबिका लक्ष्मण सगुण था। उनका जन्म 18 अप्रैल 1916 को नासिक के पास येवला गांव में हुआ था।

अशिक्षित होने के कारण वे रोज़गार की तलाश में पुणे आईं और आर्यन फिल्म कंपनी के मालिक नानासाहेब सरपोतदार के घर में बर्तन-धुलाई जैसे छोटे-मोटे काम करने लगीं। लेकिन नानासाहेब ने 1928 में उन्हें ‘पतितोद्धार’ फिल्म में भूमिका दी और उनका नाम ‘मिस अंबू’ रखा। आगे कई वर्षों तक उन्होंने मूक फिल्मों में काम किया। इसी दौरान उनकी मुलाकात निर्देशक जी. जी. पवार से हुई और 1938 में दोनों ने विवाह कर लिया। तभी से वे ललिता पवार के नाम से जानी जाने लगीं।

मा. भगवान की एक स्टंट फिल्म में काम करते समय एक दृश्य था जिसमें उन्हें थप्पड़ मारा जाना था। वह थप्पड़ इतना जोरदार था कि उनके कान से खून निकलने लगा और उनके चेहरे के बाएं हिस्से को लकवा मार गया। बाद में वे ठीक तो हो गईं, लेकिन इसका असर उनकी आंख पर पड़ा। बात करते समय उनकी आंख अपने आप खुलती-बंद होती रहती थी। इसके कारण उन्हें नायिका की भूमिकाएं करने में कठिनाई होने लगी।

लेकिन उन्होंने इसी कमजोरी को अपनी ताकत बना लिया और अपने अभिनय को और प्रभावशाली बना दिया।

ललिता पवार मराठी फिल्मों की तुलना में हिंदी फिल्मों में अधिक प्रसिद्ध हुईं। उन्होंने उस दौर के राज कपूर, जयराज, शम्मी कपूर, नूतन, मीना कुमारी जैसे सभी बड़े कलाकारों के साथ काम किया। ‘दाग’, ‘श्री 420’, ‘परवरिश’, ‘सुजाता’, ‘अनाड़ी’, ‘ससुराल’, ‘जंगली’, ‘सेहरा’, ‘भरोसा’, ‘संगम’, ‘लव इन टोक्यो’, ‘सूरज’ जैसी फिल्मों में उनके अभिनय को आज भी याद किया जाता है। 1938 में उन्होंने ‘दुनिया क्या है’ नामक हिंदी फिल्म का निर्माण भी किया था।

उन्होंने गुजराती और भोजपुरी फिल्मों में भी काम किया। हिंदी फिल्मों में व्यस्त रहने के बावजूद उन्होंने मराठी फिल्मों में काम करना नहीं छोड़ा। ‘घरचा भेदी’, ‘सतीचं वाण’, ‘कुलस्वामिनी अंबाबाई’ जैसी उनकी मराठी फिल्में भी काफी लोकप्रिय रहीं। खासकर सास के कठोर और अत्याचारी किरदार को उन्होंने इतने प्रभावशाली ढंग से निभाया कि दर्शक भी उन्हें देखकर डर जाते थे।

उम्र के बढ़ने के साथ वे अकेली हो गईं और उन्होंने मुंबई छोड़कर पुणे में बसने का निर्णय लिया। पुणे में अकेले जीवन बिताते हुए उन्होंने एक-दो मराठी फिल्मों में काम किया। फरवरी 1998 में उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। दुर्भाग्यवश, उनके निधन के समय उनके पास कोई नहीं था। उनकी मृत्यु के एक-दो दिन बाद जब घर का दरवाजा तोड़ा गया, तब उनका निष्प्राण शरीर मिला।

चार सौ से अधिक फिल्मों में अपने अभिनय का प्रभाव छोड़ने वाली इस महान अभिनेत्री ने समय के पर्दे के पीछे बहुत ही शांत तरीके से विदा ली।

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