एसआईआर मैपिंग में गड़बड़ी का आरोप, हजारों आदिवासी परिवारों पर नाम कटने का डर
जमशेदपुर। पूर्वी सिंहभूम के गोलमुरी-सह-जुगसलाई प्रखंड के अंतर्गत आने वाले 46 - पोटका एसटी विधानसभा क्षेत्र के ग्रामीण इलाकों में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान सामने आई कथित त्रुटियों को लेकर ग्रामीणों और मांझी बाबाओं में चिंता बढ़ गई है। आरोप है कि कई राजस्व गांवों की वर्ष 2003 की मतदाता सूची से सही तरीके से मैपिंग नहीं होने के कारण हजारों आदिवासी परिवारों को नोटिस जारी किए गए हैं। इससे निर्वाचन आयोग द्वारा निर्धारित दस्तावेज उपलब्ध नहीं करा पाने वाले ग्रामीणों के नाम आगामी मतदाता सूची से हटने की आशंका जताई जा रही है।
मामले को लेकर पोटका प्रखंड के मांझी बाबा और ग्राम प्रधानों ने मुख्य चुनाव आयुक्त को पत्र भेजकर हस्तक्षेप की मांग की है। ग्रामीणों का कहना है कि अधिकांश लोगों के पास खतियान, पंचायत पहचान पत्र और अन्य सामान्य दस्तावेज तो उपलब्ध हैं, लेकिन उम्र अथवा वंशावली से संबंधित अलग से पारंपरिक प्रमाण-पत्र नहीं हैं। ऐसे में उपलब्ध पहचान दस्तावेजों को भी उम्र और पहचान के वैध प्रमाण के तौर पर स्वीकार करने की मांग की गई है।
ग्रामीण प्रतिनिधियों का तर्क है कि पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में पारंपरिक व्यवस्था के तहत ग्राम प्रधान और ग्राम सभाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है। उनका कहना है कि वंशावली की पुष्टि करने का अधिकार ग्राम सभा और पारंपरिक ग्राम नेतृत्व को प्राप्त है और इसका उल्लेख पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम यानी पेसा कानून के प्रावधानों में भी किया गया है।
नए सिरे से री-मैपिंग की मांग
मांझी बाबा और ग्राम प्रधानों ने पूरे ग्रामीण क्षेत्र में एसआईआर की री-मैपिंग नए सिरे से कराने की मांग की है। उनका कहना है कि प्रक्रिया में सुधार नहीं होने पर मूल खूंटकाटी, और खुदकास्त रैयतदार परिवारों के नाम मतदाता सूची से छूटने का खतरा बना रहेगा।
इसके साथ ही ग्राम प्रधान या मांझी बाबा द्वारा सत्यापित और मुहरबंद वंशावली को मान्यता देने की मांग भी उठाई गई है। ग्रामीणों ने प्रत्येक पंचायत स्तर पर विशेष शिविर लगाने का सुझाव दिया है, जहां ग्राम सभा की प्रत्यक्ष मौजूदगी में दस्तावेजों और वंशावली का सत्यापन किया जाए।
ग्रामीण प्रतिनिधियों का कहना है कि एसआईआर जैसी महत्वपूर्ण प्रक्रिया में स्थानीय पारंपरिक व्यवस्था और ग्राम सभाओं की भागीदारी सुनिश्चित होने से न केवल विवाद कम होंगे, बल्कि वास्तविक मतदाताओं के नाम सूची में सुरक्षित रखने में भी मदद मिलेगी। उनका आग्रह है कि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी तरीके से पूरी की जाए, ताकि किसी भी पात्र ग्रामीण का लोकतांत्रिक और मतदान का अधिकार प्रभावित न हो।