Supreme Court : 'Day Light Dacoity & Carnage' By Govt & Corporate Hospitals
यह लेख सरल हिंदी और आम बोलचाल की भाषा में लिखा गया है, ताकि देश के अधिक से अधिक नागरिक दवाओं की कीमतों और अपने अधिकारों के बारे में जागरूक हो सकें। गंभीर बीमारियों के इलाज में दवाओं और अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाली चिकित्सा सामग्री की कीमतें मरीजों और उनके परिवारों पर बड़ा आर्थिक बोझ डाल सकती हैं। इस लेख का उद्देश्य दवाओं की कीमतों से जुड़े मुद्दों और सरकार द्वारा उठाए गए कदमों की जानकारी देना है।
1. सुप्रीम कोर्ट ने दवाओं की कीमतों में बड़े अंतर पर जताई चिंता
सितंबर 2026 में सुप्रीम कोर्ट में कैंसर की कुछ जरूरी दवाओं के खरीद मूल्य और पैकेट पर छपे अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) के बीच बड़े अंतर का मुद्दा उठा। रिपोर्टों के अनुसार, एक दवा का खुदरा विक्रेता मूल्य (PTR) लगभग ₹2,700 था, जबकि उसका MRP ₹27,000 बताया गया। इस तरह के अंतर ने दवाओं की कीमतों में पारदर्शिता और मरीजों पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ को लेकर सवाल खड़े किए।
2. उत्तर प्रदेश में अस्पतालों की फार्मेसियों की जांच
उत्तर प्रदेश खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन (UPFSDA) की जांच से संबंधित रिपोर्टों में कुछ अस्पतालों में दवाओं के खरीद मूल्य और मरीजों से वसूली जाने वाली कीमत के बीच बड़े अंतर की जानकारी सामने आई। कुछ मामलों में यह अंतर 67 गुना तक बताया गया। ऐसे मामले दवाओं की कीमतों में पारदर्शिता और मरीजों को उचित मूल्य पर दवाएं उपलब्ध कराने की आवश्यकता को रेखांकित करते हैं।
3. अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाली चिकित्सा सामग्री की कीमतें
महाराष्ट्र में अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाली चिकित्सा सामग्री के खरीद मूल्य और MRP के बीच अंतर को लेकर भी आंकड़े सामने आए हैं। महाराष्ट्र FDA के पूर्व आयुक्त तुकाराम मुंढे द्वारा साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार, कुछ उत्पादों के मूल्य इस प्रकार बताए गए थे:
- IV ड्रिप सेट: खरीद मूल्य लगभग ₹11.05 और MRP ₹325।
- सिरिंज: खरीद मूल्य लगभग ₹6.75 और MRP ₹57.20।
- पैरासिटामोल ड्रिप: खरीद मूल्य लगभग ₹33 और मरीज के बिल में लगभग ₹408।
- एंटीबायोटिक इंजेक्शन: खरीद मूल्य लगभग ₹180 और मरीज के बिल में लगभग ₹950।
ये उदाहरण कुछ चिकित्सा उत्पादों के खरीद मूल्य और मरीजों से वसूली गई राशि के बीच अंतर को दर्शाते हैं। हालांकि, खरीद मूल्य और MRP के बीच का अंतर अपने आप में हर मामले में अवैध वसूली का प्रमाण नहीं होता। संबंधित नियमों, करों और बिलिंग व्यवस्था को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।
4. कैंसर की दवाओं पर 30% ट्रेड मार्जिन सीमा
केंद्र सरकार ने गैर-अनुसूचित कैंसर-रोधी दवाओं पर ट्रेड मार्जिन को 30% तक सीमित करने का फैसला घोषित किया है। सरकार के अनुसार, इस कदम का उद्देश्य दवाओं की कीमतों में अत्यधिक अंतर को कम करना और मरीजों के इलाज का आर्थिक बोझ घटाना है। सरकार ने अनुमान जताया है कि इस कदम से मरीजों को सालाना लगभग ₹2,500 करोड़ की बचत हो सकती है और कुछ दवाओं की कीमतों में 70% तक कमी संभव है। हालांकि, वास्तविक बचत और कीमतों में कमी संबंधित दवाओं तथा लागू मूल्य निर्धारण नियमों पर निर्भर करेगी।
ट्रेड मार्जिन का अर्थ क्या है?
ट्रेड मार्जिन दवा की आपूर्ति श्रृंखला में खरीद मूल्य और बिक्री मूल्य के बीच के अंतर से संबंधित होता है। सरकार द्वारा घोषित 30% सीमा गैर-अनुसूचित कैंसर-रोधी दवाओं के लिए है। इस व्यवस्था के अंतर्गत कौन-सी दवाएं आती हैं और कीमतों की गणना कैसे होगी, यह संबंधित सरकारी आदेशों और लागू नियमों पर निर्भर करता है। इसलिए इस सीमा को सभी दवाओं पर लागू सामान्य नियम के रूप में नहीं समझना चाहिए।
निष्कर्ष
दवाओं और चिकित्सा सामग्री की कीमतों में पारदर्शिता मरीजों के हित में महत्वपूर्ण है। मरीज और उनके परिजन दवाओं के बिल, MRP और उपलब्ध मूल्य संबंधी जानकारी को ध्यान से देख सकते हैं। यदि किसी दवा या चिकित्सा सामग्री की कीमत को लेकर संदेह हो, तो संबंधित नियामक प्राधिकरण से जानकारी या सहायता ली जा सकती है। कैंसर की दवाओं पर ट्रेड मार्जिन सीमा का उद्देश्य इलाज को अधिक किफायती बनाना है। इसके वास्तविक प्रभाव का आकलन लागू नियमों और आगे उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर किया जा सकेगा।