भारतीय लोकतंत्र में एक ऐतिहासिक मौका दक्षिण भारतीय राज्यों के हाथ से फिसल गया है। भाजपा नीत केंद्र सरकार ने महिला आरक्षण विधेयक (नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023) को लागू करने के लिए तीन संविधान संशोधन विधेयकों का पैकेज संसद में पेश किया। इसमें लोकसभा की सीटों को 543 से बढ़ाकर लगभग 850 करने, 50 प्रतिशत समानुपातिक वृद्धि (pro-rata increase) सुनिश्चित करने और एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रावधान था। लेकिन विपक्ष, खासकर दक्षिण के कुछ दलों ने इसे हार कर दिया। अब 2027 की जनगणना के बाद अनुच्छेद 81 और 82 के तहत स्वत: सीमा पुनर्निर्धारण (delimitation) होगा, जो दक्षिण के राज्यों तमिलनाडु, केरल आदि की लोकसभा सीटों को कम करेगा और उत्तर प्रदेश, बिहार जैसे राज्यों को बढ़ाएगा।
क्या था BJP का प्रस्ताव?
2023 में पास हुआ महिला आरक्षण कानून 33 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करता है, लेकिन यह लागू तभी होगा जब जनगणना के बाद delimitation पूरा हो। केंद्र ने अब इसे तेज करने के लिए संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026, Delimitation Bill, 2026 और Union Territories Laws (Amendment) Bill पेश किए।
सरकार का तर्क था:
• लोकसभा की कुल सीटें बढ़ाकर 850 (या 816) करें।
• हर राज्य की मौजूदा अनुपात (current ratio) बनाए रखते हुए 50 प्रतिशत अतिरिक्त सीटें दें।
• उदाहरण: तमिलनाडु की 39 सीटें 59 हो जाएंगी, केरल की 20 सीटें 30, कर्नाटक की 28 सीटें 42, आंध्र की 25 सीटें 38।
• पांच दक्षिणी राज्यों (TN, केरल, कर्नाटक, आंध्र, तेलंगाना) की कुल सीटें 129 से बढ़कर 195 हो जाएंगी। उनका प्रतिशत हिस्सा 23.76% से बढ़कर 23.87% रहेगा – यानी मौजूदा अनुपात बरकरार।
• महिलाओं को भी 33% आरक्षण मिलेगा, लेकिन सबके लिए ज्यादा खुले सीटें।
गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में साफ कहा कि दक्षिणी राज्यों का प्रतिनिधित्व घटेगा – यह “झूठी अफवाह” है। उन्होंने आश्वासन दिया कि “एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य” का सिद्धांत बरकरार रहेगा, लेकिन दक्षिण के विकास और जनसंख्या नियंत्रण की सफलता को दंडित नहीं किया जाएगा।
विपक्ष ने क्यों रोका?
विपक्ष (कांग्रेस, DMK, तेलंगाना राष्ट्र समिति आदि) ने इसे “उत्तर vs दक्षिण” का मुद्दा बनाकर 2/3 बहुमत (352 वोट) हासिल नहीं होने दिया। विधेयक 298-230 से हार गया। विपक्ष का आरोप था कि जनसंख्या के आधार पर delimitation दक्षिण को “सजा” देगा। लेकिन सरकार का प्रस्ताव तो ठीक उलटा था – मौजूदा अनुपात बनाए रखना!
परिणाम?
• महिला आरक्षण और आगे टल गया (2034 के बाद संभव)।
• 2027 जनगणना के बाद अनुच्छेद 81 एवं 82 स्वत: सक्रिय हो जाएंगे।
• वर्तमान 543 सीटों पर ही delimitation होगा।
• 2011 जनगणना के आंकड़ों के आधार पर अनुमान: तमिलनाडु की सीटें 39 से घटकर 32, केरल की 20 से 15। वहीं UP की 80 से 89, बिहार की 40 से 46, राजस्थान की 25 से 30 हो सकती हैं। 2027 जनगणना के बाद यह और बढ़ जाएगा।
दक्षिण के मुख्यमंत्री (स्टालिन, रेवंत रेड्डी आदि) ने इसे “काला कानून” बताया और विरोध किया। लेकिन वास्तव में उन्होंने अपने राज्यों का मौका गंवा दिया। BJP ने स्पष्ट रूप से कहा – “दक्षिण के लिए 50% अतिरिक्त सीटें देने का प्रस्ताव था, लेकिन आपने खारिज कर दिया। अब जनसंख्या आधारित delimitation पर 543 सीटों में दक्षिण की हिस्सेदारी घटेगी।”
क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि 1971 जनगणना पर आधारित फ्रीज (2001 संशोधन द्वारा 2026 तक) अब समाप्त हो रहा है। दक्षिण ने परिवार नियोजन में सफलता हासिल की, लेकिन अगर delimitation बिना अतिरिक्त सीटों के हुआ तो उनका संसदीय प्रभाव कम होगा। BJP का प्रस्ताव संघीय संतुलन बनाए रखने का था – लेकिन विपक्ष ने इसे राजनीतिक चाल बताया।
आगे क्या?
अब सरकार 2027 जनगणना के बाद सामान्य delimitation प्रक्रिया अपनाएगी। दक्षिणी राज्य अगर अपना प्रतिनिधित्व बचाना चाहते हैं तो उन्हें केंद्र से बातचीत करनी होगी। लेकिन मौका खो चुके हैं। भाजपा का कहना है – “महिलाओं ने इंतजार किया, दक्षिण ने भी इंतजार किया। अब 2029 चुनाव में जनता फैसला करेगी।”
यह घटना लोकतंत्र की याद दिलाती है कि राजनीतिक हठधर्मिता कभी-कभी राष्ट्रीय हितों को नुकसान पहुंचाती है। दक्षिण के मतदाता अब देखेंगे – कौन सा दल उनके हितों की रक्षा कर रहा था? BJP ने मौका दिया, लेकिन दक्षिण के कुछ नेता उसे “encash” नहीं कर पाए।