मुंबई : महाराष्ट्र का नाम आते ही दिमाग में वड़ा पाव, उसल पाव, पूरण पोली और मिसल पाव जैसी अनेकों मशहूर डिशों की तस्वीर बनने लगती है. इन्हीं में से एक है मिसल पाव, जो अपने तीखे स्वाद और मसालेदार तरी की वजह से पूरे देश में पसंद की जाती है। आज यह डिश छोटे स्टॉल से लेकर बड़े कैफे और रेस्टोरेंट तक हर जगह मिल जाती है. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि “मिसल पाव” नाम आखिर पड़ा कैसे और इसके पीछे क्या कहानी छिपी है. इस डिश का इतिहास स्वाद जितना ही रोचक माना जाता है.
क्या है मिसल पाव?
मिसल पाव महाराष्ट्र की एक पारंपरिक डिश है, जिसे मुख्य रूप से अंकुरित मटकी, मसालेदार ग्रेवी और कई तरह की टॉपिंग्स के साथ तैयार किया जाता है. इसके ऊपर फरसान, प्याज, धनिया और नींबू डाला जाता है. साथ में मक्खन लगे पाव सर्व किए जाते हैं, जो इसके स्वाद को और बढ़ा देते हैं.
यह डिश स्वाद में तीखी जरूर होती है, लेकिन इसे खाने वाले लोग इसकी मसालेदार तरी के दीवाने माने जाते हैं.मिसल” शब्द मराठी भाषा के “मिसळ” से लिया गया है. मराठी में इसका मतलब होता है “मिक्स करना” या “कई चीजों का मिश्रण”. इस डिश में अलग-अलग चीजें मिलाई जाती हैं, जैसे स्प्राउट्स, मसाले, तरी, फरसान और टॉपिंग्स. यही वजह है कि इसे “मिसल” कहा जाने लगा। वहीं “पाव” शब्द पुर्तगाली संस्कृति से जुड़ा माना जाता है. भारत में पाव का इस्तेमाल खासतौर पर मुंबई और महाराष्ट्र के खाने में काफी लोकप्रिय हुआ। बाद में मिसल के साथ पाव परोसा जाने लगा और इसका नाम “मिसल पाव” बन गया। कई फूड एक्सपर्ट्स मानते हैं कि शुरुआत में मिसल पाव मजदूरों और कामकाजी लोगों का पेट भरने वाला सस्ता भोजन हुआ करता था। इसमें अंकुरित दालें होने की वजह से प्रोटीन मिलता था और मसालेदार तरी इसे स्वादिष्ट बनाती थी. धीरे-धीरे इसका स्वाद लोगों को इतना पसंद आने लगा कि यह महाराष्ट्र की पहचान बन गई. आज पुणे, कोल्हापुर, नासिक और ठाणे की मिसल पाव सबसे ज्यादा मशहूर मानी जाती है. कोल्हापुरी मिसल को सबसे ज्यादा तीखा माना जाता है. इसकी लाल मसालेदार तरी काफी फेमस है. वहीं पुणेरी मिसल का स्वाद थोड़ा हल्का और संतुलित माना जाता है. कई जगह दही, पापड़ या छाछ के साथ भी मिसल सर्व की जाती है। इसका स्वाद ऐसा है कि जो एक बार इसे चखा वह बार बार इसे अवश्य खाता है।