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किताबें तैयार हैं, कैमरा भी तैयार है: ओटीटी से बदल रहा परिदृश्य, हिंदी लेखकों और नई कहानियों के लिए शुभ संकेत* *(आनन्द कुमार द्विवेदी/ कौशाम्बी ब्यूरो)

By ANAND KUMAR DWIVEDI • 2026-09-14 06:31 • 2 views   Share WhatsApp Share Facebook Share X
किताबें तैयार हैं, कैमरा भी तैयार है: ओटीटी से बदल रहा परिदृश्य, हिंदी लेखकों और नई कहानियों के लिए शुभ संकेत*  *(आनन्द कुमार द्विवेदी/ कौशाम्बी ब्यूरो)

किताबें तैयार हैं, कैमरा भी तैयार है: ओटीटी से बदल रहा परिदृश्य, हिंदी लेखकों और नई कहानियों के लिए शुभ संकेत

(आनन्द कुमार द्विवेदी/कौशाम्बी ब्यूरो)

हिंदी सिनेमा और ओटीटी में पिछले कुछ वर्षों से किताबों के रूपांतरण का सिलसिला देखने को मिल रहा है। भारत के अलग-अलग हिस्सों की जमीनी कहानियां अब केवल अंग्रेजी से ही नहीं, बल्कि दूसरी भारतीय भाषाओं से भी हिंदी सिनेमा और ओटीटी की विषय-वस्तु बन रही हैं। इसमें लेखक के अनुसार, मामी फिल्म फेस्टिवल के ‘वर्ड टू स्क्रीन’ कार्यक्रम की भी भूमिका रही है। इसके अलावा कुछ एजेंट्स ने किताबों के अधिकार लेकर उन्हें प्रोडक्शन हाउस तक पहुंचाने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया है।

यह विषय फिर चर्चा में इसलिए आया है क्योंकि नेटफ्लिक्स ने ‘मुसाफिर कैफे’ सीरीज के दूसरे सीजन की घोषणा की है। यह सीरीज दिव्य प्रकाश दुबे की किताब के पात्रों पर आधारित है। लेखक के अनुसार, पहले सीजन को मिले दर्शकों के सकारात्मक रेस्पॉन्स के बाद दूसरे सीजन की घोषणा हिंदी साहित्य और उसके स्क्रीन रूपांतरण के लिहाज से महत्वपूर्ण है।

किसी साहित्यिक या लोकप्रिय किताब का सिनेमाई रूपांतरण उसकी कहानी और संवेदना को बड़े दर्शक वर्ग तक पहुंचाने का माध्यम बन सकता है। साथ ही, इससे लेखक को अपने लेखन के लिए आर्थिक पारिश्रमिक और नए पाठक-दर्शक मिलने की संभावना भी बनती है।

हिंदी साहित्य से स्क्रीन तक पहुंची कई कहानियां

यह पहला उदाहरण नहीं है जब किसी हिंदी किताब या कहानी का स्क्रीन रूपांतरण हुआ हो। सत्य व्यास की ‘चौरासी’ पर आधारित वेब सीरीज ‘ग्रहण’ को भी दर्शकों से प्रतिक्रिया मिली थी। इसी तरह चरण सिंह पथिक की कहानी ‘दो बहनें’ से प्रेरित विशाल भारद्वाज की फिल्म ‘पटाखा’ भी हिंदी साहित्यिक लेखन के सिनेमाई रूपांतरण का एक उदाहरण है।

लेखक का मानना है कि ‘तीसरी कसम’ की बॉक्स ऑफिस असफलता का असर हिंदी साहित्य और लोकप्रिय लेखन के फिल्मी रूपांतरण पर पड़ा। उनके अनुसार, यदि फिल्म व्यावसायिक रूप से सफल होती तो संभवतः हिंदी साहित्य और हिंदी लेखकों के लिए सिनेमा में अधिक अवसर विकसित होते। हालांकि, यह लेखक का व्यक्तिगत विश्लेषण है।

सहयोगी इकोसिस्टम की जरूरत

ऐसा नहीं है कि हिंदी में सिनेमाई रूपांतरण के योग्य रचनाओं की कमी रही है। लेखक के अनुसार, समस्या कई बार इन रचनाओं की व्यापक पहुंच और उनके आसपास विकसित सहयोगी इकोसिस्टम की रही है। लंबे समय तक हिंदी सिनेमा में उर्दू के लेखकों और शायरों की मौजूदगी अपेक्षाकृत अधिक रही, जबकि हिंदी लेखकों और कवियों की भागीदारी सीमित रही।

हाल के वर्षों में ओटीटी प्लेटफॉर्म के विस्तार के साथ कहानी कहने के लिए नए माध्यम और दर्शक वर्ग सामने आए हैं। इससे विभिन्न भाषाओं और क्षेत्रों की कहानियों के लिए भी संभावनाएं बढ़ी हैं। लेखक का मानना है कि हिंदी संसार की कहानियों के लिए यह बदलाव नए अवसर लेकर आया है।

पाठक और रूपांतरण के बीच संबंध

लेखक के अनुसार, हिंदी साहित्य का कुछ लेखन आलोचकों, अध्यापकों और साहित्यिक समूहों की स्वीकृति को ध्यान में रखकर लिखा जाता है, जबकि व्यापक पाठक वर्ग को अपेक्षाकृत कम महत्व मिलता है। उनका मानना है कि स्क्रीन रूपांतरण के लिए ऐसी कहानियां अधिक उपयोगी हो सकती हैं जिनकी पाठकों के बीच मजबूत पहुंच और भावनात्मक जुड़ाव हो।

साहित्यिक कृति के स्क्रीन रूपांतरण को लेकर मूल रचना के साथ न्याय होने या न होने की बहस भी लंबे समय से चलती रही है। हालांकि, ओटीटी के विस्तार ने इस बहस के साथ-साथ नई कहानियों को दर्शकों तक पहुंचाने के रास्ते भी खोले हैं।

हिंदी किताबों के लिए बढ़ती संभावनाएं

लेखक के अनुसार, कई हिंदी किताबों के स्क्रीन राइट्स बिक चुके हैं और कुछ परियोजनाएं आगे की प्रक्रिया में हैं। यदि यह प्रवृत्ति आगे भी जारी रहती है, तो आने वाले वर्षों में हिंदी साहित्य से जुड़े और अधिक कथानक सिनेमा तथा ओटीटी पर दिखाई दे सकते हैं।

हिंदी साहित्य के व्यापक संसार में अलग-अलग क्षेत्रों, समाजों और अनुभवों से जुड़ी अनेक कहानियां मौजूद हैं। ओटीटी के विस्तार ने इन कहानियों के लिए नए दर्शक वर्ग तक पहुंचने की संभावना बढ़ाई है। इससे नए लेखकों, प्रकाशकों और निर्माताओं के बीच सहयोग के अवसर भी विकसित हो सकते हैं।

किताब से स्क्रीन तक का यह सफर हिंदी लेखकों के लिए केवल आर्थिक अवसर नहीं, बल्कि अपनी कहानियों को बड़े दर्शक वर्ग तक पहुंचाने का माध्यम भी बन सकता है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि साहित्य और स्क्रीन के बीच बढ़ती यह साझेदारी किस तरह नई कहानियों और नए लेखकों को सामने लाती है।

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