श्री कृष्ण की नगरी द्वारका
श्रीकृष्ण की दिव्य नगरी द्वारका – एक संक्षिप्त लेकिन विस्तृत कथा
भगवान श्रीकृष्ण की नगरी द्वारका भारत के गुजरात राज्य के पश्चिमी तट पर स्थित एक प्राचीन और पवित्र नगर है। इसे हिंदू धर्म के सप्त पुरियों (सात मोक्षदायिनी नगरों) और चार धामों में भी स्थान प्राप्त है। मान्यता है कि जब भगवान श्रीकृष्ण ने कंस का वध किया, तब कंस के ससुर जरासंध ने बार-बार मथुरा पर आक्रमण किया। अपने प्रजाजनों की सुरक्षा के लिए श्रीकृष्ण ने समुद्र देव से भूमि प्राप्त की और विश्वकर्मा जी से एक अद्भुत स्वर्णिम नगरी का निर्माण कराया। यही नगरी द्वारका कहलायी।
द्वारका अपनी भव्यता, विशाल महलों, चौड़ी सड़कों, सुंदर उद्यानों और समृद्ध व्यापार के लिए प्रसिद्ध थी। कहा जाता है कि इस नगर में सोने-चाँदी से सजे महल, विशाल सभागृह और हजारों सुंदर भवन थे। श्रीकृष्ण ने यहीं से अपने राज्य का संचालन किया और धर्म, न्याय तथा लोककल्याण का संदेश दिया। उनकी आठ प्रमुख रानियाँ और यादव वंश के अनेक परिवार इसी नगरी में निवास करते थे।
महाभारत काल की अनेक महत्वपूर्ण घटनाओं का संबंध भी द्वारका से है। पांडवों और श्रीकृष्ण की अनेक योजनाएँ यहीं बनीं। कुरुक्षेत्र युद्ध से पहले और बाद में भी द्वारका भारतीय इतिहास और धर्म का प्रमुख केंद्र रही।
श्रीकृष्ण के पृथ्वी से प्रस्थान के बाद यादव वंश का विनाश हुआ। पुराणों के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण के देहत्याग के कुछ समय बाद समुद्र ने धीरे-धीरे पूरी द्वारका नगरी को अपने भीतर समा लिया। आज भी समुद्र के भीतर प्राचीन अवशेष मिलने के कारण अनेक लोग मानते हैं कि प्राचीन द्वारका वास्तव में अस्तित्व में थी।
वर्तमान में गुजरात के देवभूमि द्वारका जिले में स्थित द्वारकाधीश मंदिर करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। यहाँ प्रतिवर्ष लाखों भक्त भगवान द्वारकाधीश के दर्शन करने आते हैं। गोमती घाट, रुक्मिणी देवी मंदिर, बेट द्वारका और नागेश्वर ज्योतिर्लिंग भी यहाँ के प्रमुख तीर्थस्थल हैं।
द्वारका केवल एक प्राचीन नगर नहीं, बल्कि धर्म, भक्ति, नीति, त्याग और आदर्श शासन का प्रतीक है। श्रीकृष्ण की यह पावन नगरी आज भी करोड़ों लोगों के लिए श्रद्धा, आस्था और आध्यात्मिक प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है।