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*पूरी पीढ़ी को कटघरे में खड़ा करना कितना उचित है?*

By NIDHI SRIVASTAVA • 2026-08-10 04:55 • 2 views   Share WhatsApp Share Facebook Share X
*पूरी पीढ़ी को कटघरे में खड़ा करना कितना उचित है?*

*पूरी पीढ़ी को कटघरे में खड़ा करना कितना उचित है?*

आजकल अक्सर यह सुनने को मिलता है कि “आज की पीढ़ी ऐसी है…”। कभी उसे अधीर कहा जाता है, कभी स्वार्थी, कभी तकनीक पर अत्यधिक निर्भर और कभी रिश्तों एवं सामाजिक जिम्मेदारियों के प्रति उदासीन। निस्संदेह, आज के युवाओं में कुछ ऐसी प्रवृत्तियाँ दिखाई देती हैं जिन पर गंभीर चर्चा आवश्यक है, लेकिन कुछ उदाहरणों के आधार पर पूरी पीढ़ी को एक ही दृष्टि से देखना न तो न्यायसंगत है और न ही तार्किक।

आज का युवा एकरूप नहीं है। उसके भीतर विचारों, मूल्यों, आकांक्षाओं और जीवन-दृष्टि की अद्भुत विविधता है। कोई अत्यंत संवेदनशील और जिम्मेदार है, कोई नवाचार और उद्यमिता के क्षेत्र में नए रास्ते बना रहा है, कोई सामाजिक परिवर्तन का वाहक है, तो कोई अभी अपने जीवन की दिशा और पहचान तलाश रहा है। एक ही पीढ़ी में परंपराओं को महत्व देने वाले युवा भी हैं और रूढ़ियों को चुनौती देने वाले भी।

वास्तव में हर पीढ़ी विविधताओं का समुच्चय होती है। हर पीढ़ी में परिपक्व और अपरिपक्व, आदर्शवादी और व्यावहारिक, जिम्मेदार और गैर-जिम्मेदार तथा संवेदनशील और असंवेदनशील लोग होते हैं। इसलिए किसी पीढ़ी के कुछ व्यवहारों को उसकी संपूर्ण पहचान मान लेना एक प्रकार का अतिसामान्यीकरण है।

समाजशास्त्र हमें यह समझने में सहायता करता है कि किसी पीढ़ी के व्यवहार को केवल उसके जन्म-वर्ष से नहीं समझा जा सकता। परिवार, शिक्षा, आर्थिक परिस्थितियाँ, सामाजिक परिवेश, व्यक्तिगत अनुभव, व्यक्तित्व, मित्र समूह और तकनीकी वातावरण—ये सभी किसी व्यक्ति की सोच और व्यवहार को प्रभावित करते हैं।

यह भी सच है कि डिजिटल युग ने युवाओं के जीवन को गहराई से बदला है। सोशल मीडिया, त्वरित सूचना और लगातार उपलब्ध डिजिटल सामग्री ने उनके सीखने, संवाद करने, काम करने और संबंध बनाने के तरीके को प्रभावित किया है। लेकिन तकनीक का अधिक उपयोग अपने आप में यह प्रमाण नहीं है कि युवा संवेदनहीन या गैर-जिम्मेदार हो गए हैं। आज अनेक युवा इसी तकनीक का उपयोग शिक्षा, उद्यमिता, सामाजिक जागरूकता, रचनात्मकता और सामाजिक परिवर्तन के लिए कर रहे हैं।

हाँ, कुछ वास्तविक चिंताएँ अवश्य हैं—तत्काल परिणाम पाने की प्रवृत्ति, कम होती धैर्य-क्षमता, स्क्रीन पर बढ़ती निर्भरता, मानसिक दबाव और रिश्तों में संवाद की कमी जैसे विषय गंभीर विमर्श की मांग करते हैं। लेकिन इन समस्याओं का समाधान पूरी पीढ़ी को दोषी ठहराने में नहीं, बल्कि उनके कारणों को समझने में है।

यहाँ परिवार, विद्यालय और समाज की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि युवा कहीं भ्रमित हैं, अधीर हैं या सामाजिक रूप से कटे हुए महसूस कर रहे हैं, तो हमें केवल यह पूछने के बजाय कि “आज की पीढ़ी को क्या हो गया है?”, यह भी पूछना चाहिए कि हमने उन्हें कैसा परिवेश दिया है? क्या हमने उन्हें संवाद, भावनात्मक समर्थन, जिम्मेदारी और निर्णय लेने की पर्याप्त स्वतंत्रता दी है?

पीढ़ियों के बीच अंतर स्वाभाविक है। हर पीढ़ी अलग सामाजिक और तकनीकी परिस्थितियों में बड़ी होती है। इसलिए अंतर को संघर्ष का कारण बनाने के बजाय संवाद का अवसर बनाया जाना चाहिए।

आलोचना आवश्यक है, लेकिन आलोचना तथ्यों, अनुभवों और संतुलित दृष्टिकोण पर आधारित होनी चाहिए—पूर्वाग्रह और वायरल धारणाओं पर नहीं।

एक परिपक्व समाज यह पूछने के बजाय कि “आज की पीढ़ी में क्या खराब है?”, यह पूछता है कि “आज की पीढ़ी किन परिस्थितियों में विकसित हो रही है और उसकी सकारात्मक क्षमताओं को किस प्रकार दिशा दी जा सकती है?”

युवाओं को उनके कार्यों और निर्णयों के लिए जिम्मेदार अवश्य ठहराया जाना चाहिए, लेकिन केवल उनकी पीढ़ी की पहचान के आधार पर उनका मूल्यांकन नहीं किया जाना चाहिए।

क्योंकि कोई भी पीढ़ी एक कहानी नहीं होती; वह करोड़ों अलग-अलग व्यक्तित्वों, अनुभवों, संघर्षों, मूल्यों और संभावनाओं का संगम होती है।

शायद आज आवश्यकता पीढ़ियों को परिभाषित करने की नहीं, बल्कि पीढ़ियों के बीच संवाद का पुल बनाने की है।

©® डा० निधि श्रीवास्तव

#समाज#अवधारणा
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