National

सहाफ़त कटघरे में! सवाल पर पहरा या सुरक्षा का मामला? दिल्ली में महिला पत्रकारों से कथित मारपीट ने छेड़ी नई बहस

By SAIFURR EHMAN • 2026-09-05 06:15 • 2 views   Share WhatsApp Share Facebook Share X
सहाफ़त कटघरे में!  सवाल पर पहरा या सुरक्षा का मामला? दिल्ली में महिला पत्रकारों से कथित मारपीट ने छेड़ी नई बहस

नई दिल्ली।

राजधानी दिल्ली में दो महिला पत्रकारों के साथ कथित मारपीट के मामले ने सहाफ़ती आज़ादी, पुलिस की जवाबदेही और लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर एक बार फिर गंभीर बहस छेड़ दी है।

4PM न्यूज़ नेटवर्क से जुड़ी पत्रकार शाहीन खान और नफीसा खान का आरोप है कि दक्षिण दिल्ली के साकेत में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के कार्यक्रम को कवर करने के दौरान पुलिस ने उन्हें रोका। पत्रकारों का कहना है कि वे मुख्यमंत्री से सवाल करने की कोशिश कर रही थीं, जिसके बाद उन्हें पुलिस कार्रवाई का सामना करना पड़ा और बाद में थाने ले जाया गया।

पत्रकारों ने पुलिस पर बदसलूकी और मारपीट के गंभीर इल्ज़ाम लगाए हैं। सामने आए वीडियो में चोट के निशान दिखाए गए हैं। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है।

पुलिस का जवाब: सवाल नहीं, सुरक्षा व्यवस्था वजह

दिल्ली पुलिस ने इन इल्ज़ामात को ख़ारिज किया है। पुलिस का कहना है कि पत्रकारों को सवाल पूछने की वजह से नहीं, बल्कि VVIP रूट में कथित रुकावट और सुरक्षा निर्देशों का पालन नहीं करने के कारण रोका गया था।

यानी एक ही घटना की दो तस्वीरें सामने हैं—

पत्रकारों का दावा: सवाल के बाद पुलिस कार्रवाई।
पुलिस का दावा: सुरक्षा व्यवस्था में बाधा के कारण कार्रवाई।

अब ज़रूरत है कि दोनों दावों के बीच की हक़ीक़त सामने लाई जाए।

क़लम को जवाब चाहिए, खामोशी नहीं

लोकतंत्र में पत्रकार सिर्फ़ खबर लिखने वाला शख़्स नहीं होता। वह अवाम की आंख, कान और आवाज़ होता है। हुकूमत से सवाल करना उसकी ज़िम्मेदारी है और सवाल का जवाब देना लोकतांत्रिक जवाबदेही का हिस्सा।

अगर किसी पत्रकार ने सुरक्षा नियमों की ख़िलाफ़वर्ज़ी की थी, तो क़ानून के तहत कार्रवाई की जा सकती है। लेकिन अगर हिरासत में किसी तरह की मारपीट या ज़्यादती हुई है, तो उसकी भी शफ़्फ़ाफ़ और ग़ैर-जानिबदार जांच होनी चाहिए।

CCTV बताएगा—हक़ीक़त क्या थी?

इस मामले में कार्यक्रम स्थल और पुलिस स्टेशन के CCTV फुटेज, मोबाइल वीडियो, मेडिकल रिपोर्ट तथा प्रत्यक्षदर्शियों के बयान अहम सबूत हो सकते हैं।

न आरोप को तुरंत सच मानना चाहिए, न पुलिस के बयान को अंतिम हक़ीक़त।

लोकतंत्र का तक़ाज़ा है कि तथ्य सामने आएं और इंसाफ़ हो।

क़लम बनाम डंडा—फैसला किसके हक़ में?

यह मामला सिर्फ़ दो महिला पत्रकारों का नहीं है। यह उस माहौल का सवाल है जिसमें एक पत्रकार किसी मुख्यमंत्री या केंद्रीय मंत्री से बेख़ौफ़ सवाल कर सके।

सवाल अगर गलत है—जवाब दीजिए।
सवाल अगर तीखा है—तर्क दीजिए।
नियम टूटा है—क़ानून के मुताबिक़ कार्रवाई कीजिए।
लेकिन पत्रकारिता को ख़ामोश करने के लिए ताक़त का इस्तेमाल—अगर साबित होता है—तो यह लोकतंत्र के लिए बेहद गंभीर चिंता है।

आख़िरी सवाल

क्या आज के हिंदुस्तान में क़लम को सवाल पूछने की पूरी आज़ादी है?

क्योंकि—

“जिस लोकतंत्र में सवाल डरने लगें,
वहाँ जवाबदेही कमज़ोर होने लगती है।”

सहाफ़त की हिफ़ाज़त किसी एक पत्रकार की हिफ़ाज़त नहीं—यह हर नागरिक के उस हक़ की हिफ़ाज़त है, जो अपनी हुकूमत से सवाल पूछना चाहता है।

क़लम को झुकना नहीं चाहिए—और हुकूमत को सवाल से घबराना नहीं चाहिए।

##NEWDELHI
SAIFURR EHMAN 0 followers