सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि किसी वाद में मुआवजे की मांग नहीं की गई है, तो अपीलीय अदालत उसे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से देने के लिए पक्षकारों को बाध्य नहीं कर सकती।
जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें अतिक्रमण हटाने की डिक्री को बदलकर मुआवजा देने का निर्देश दिया गया था।
मामला दो सिविल मुकदमों से संबंधित था, जिनमें कथित अतिक्रमण हटाने और निर्माण रोकने की मांग की गई थी। ट्रायल कोर्ट ने वादियों के पक्ष में डिक्री पारित की थी, जिसे अपीलीय अदालत ने भी बरकरार रखा था।
हालांकि, दूसरी अपील में हाईकोर्ट ने डिक्री में बदलाव करते हुए प्रतिवादियों को मुआवजा देने का आदेश दिया था। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश को यह कहते हुए रद्द कर दिया कि बिना विधिक आधार और बिना मांगी गई राहत के मुआवजा देना उचित नहीं है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि एक बार डिक्री रद्द हो जाने के बाद निष्पादन अदालत (Execution Court) के पास किसी प्रकार की कार्यवाही करने का कोई आधार नहीं रह जाता।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले को मेरिट के आधार पर पुनः विचार के लिए हाईकोर्ट को वापस भेजने का निर्देश दिया।