May 13, 2026

“तुलसीमाला पर आपत्ति, लेकिन हिजाब पर मौन?” क्या भारत अब भी मानसिक गुलामी और चयनात्मक सेक्युलरवाद की गिरफ्त में है?

डॉ. महेश प्रसाद मिश्रा, भोपाल

भारत आज एक ऐसे वैचारिक मोड़ पर खड़ा दिखाई दे रहा है, जहाँ सबसे बड़ा प्रश्न केवल प्रशासनिक नियमों का नहीं, बल्कि समानता, सांस्कृतिक सम्मान और राष्ट्र की मानसिक स्वतंत्रता का बन चुका है।

गुजरात में परीक्षा के दौरान एक छात्रा की तुलसीमाला उतरवाए जाने की घटना ने देशभर में तीखी प्रतिक्रिया पैदा कर दी है। करोड़ों लोगों के मन में यह प्रश्न उठ रहा है कि आखिर स्वतंत्र भारत में अपनी ही सनातन परंपराओं और प्रतीकों के प्रति इतना असहज व्यवहार क्यों दिखाई देता है?

और इसी के साथ एक और प्रश्न अत्यंत तीखे स्वर में सामने आ रहा है—जब हिजाब पर संवेदनशीलता दिखाई जाती है, तो तुलसीमाला पर कठोरता क्यों?”देश का सामान्य नागरिक आज पूछ रहा है कि यदि धार्मिक पहचान और व्यक्तिगत आस्था का सम्मान लोकतंत्र का मूल सिद्धांत है, तो फिर यह सिद्धांत सभी पर समान रूप से लागू क्यों नहीं दिखाई देता?एक ओर हिजाब को “व्यक्तिगत स्वतंत्रता” और “धार्मिक अधिकार” के रूप में देखा जाता है, वहीं दूसरी ओर तुलसीमाला, तिलक, जनेऊ और अन्य सनातन प्रतीकों को कई बार “नियमों के विरुद्ध”, “अनुचित” या “कट्टरता” के चश्मे से क्यों देखा जाता है?यही विरोधाभास आज देश में “चयनात्मक सेक्युलरवाद” और “मानसिक गुलामी” की बहस को और तेज कर रहा है।

चेहरे बदल गए, मानसिकता नहीं?”सोशल मीडिया पर वायरल हो रही तस्वीरें और प्रतिक्रियाएँ इस बात की ओर संकेत कर रही हैं कि भारत का एक बड़ा वर्ग अब यह मानने लगा है कि सत्ता बदलने के बावजूद व्यवस्था की मानसिकता में अपेक्षित परिवर्तन नहीं आया। लोग पूछ रहे हैं—

  • क्या सनातन प्रतीकों से ही हमेशा समझौते की अपेक्षा की जाएगी?
  • क्या अपनी संस्कृति का सार्वजनिक पालन अब भी संदेह की दृष्टि से देखा जाएगा?
  • क्या भारत का प्रशासनिक ढाँचा आज भी औपनिवेशिक सोच से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाया है?

यह प्रश्न इसलिए भी गंभीर हैं क्योंकि भारत केवल एक राजनीतिक राष्ट्र नहीं, बल्कि हजारों वर्षों पुरानी सभ्यता और सांस्कृतिक चेतना का प्रतिनिधि देश है।

तुलसीमाला केवल माला नहीं, सांस्कृतिक अस्मिता है-वैष्णव परंपरा में तुलसी पूजनीय मानी जाती है। तुलसीमाला केवल धार्मिक आभूषण नहीं, बल्कि साधना, अनुशासन और आध्यात्मिक पहचान का प्रतीक है।ऐसे में यदि किसी छात्रा को परीक्षा देने से पहले अपनी तुलसीमाला उतारने के लिए बाध्य किया जाता है, तो यह स्वाभाविक रूप से संवेदनशील प्रतिक्रिया उत्पन्न करेगा। और जब दूसरी ओर अन्य धार्मिक प्रतीकों के प्रति अलग दृष्टिकोण दिखाई देता है, तब समाज के भीतर असंतोष और गहरा होता है।

सत्ता और प्रशासन से सीधा प्रश्न-जो शासन स्वयं को “सनातन संस्कृति”, “भारतीय सभ्यता” और “सांस्कृतिक पुनर्जागरण” का वाहक बताता है, उससे जनता यह पूछने लगी है—क्या भारतीय संस्कृति केवल भाषणों और चुनावी मंचों तक सीमित है?

  • क्या प्रशासनिक तंत्र को भारतीय परंपराओं के प्रति संवेदनशील बनाने का कोई गंभीर प्रयास हुआ?
  • क्या समानता का अर्थ केवल सनातन समाज से समायोजन करवाना रह गया है?
  • और सबसे बड़ा प्रश्न — क्या भारत सचमुच स्वतंत्र सोच वाला राष्ट्र बन पाया है, या अब भी मानसिक गुलामी की बेड़ियों में जकड़ा हुआ है?

भारत को क्या चाहिए?

भारत को न कट्टरता चाहिए और न पक्षपातपूर्ण सेक्युलरवाद। भारत को चाहिए—

  • सभी धर्मों और आस्थाओं के प्रति समान सम्मान
  • निष्पक्ष प्रशासनिक व्यवस्था
  • सांस्कृतिक संवेदनशीलता
  • और अपनी सभ्यतागत पहचान पर गर्व

क्योंकि जिस राष्ट्र का प्रशासन अपनी ही जड़ों से असहज होने लगे, वहाँ लोकतंत्र कमजोर होता है और समाज के भीतर अविश्वास बढ़ता है।आज देश का सामान्य नागरिक केवल इतना पूछ रहा है—

यदि हिजाब आस्था है, तो तुलसीमाला क्यों नहीं?”“यदि एक प्रतीक स्वतंत्रता है, तो दूसरा संदेह क्यों?”“और यदि यही चलता रहा, तो क्या यह स्वतंत्र भारत की पहचान होगी… या मानसिक गुलामी की?”

 

DR. MAHESH PRASAD MISHRA

District Reporter

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

INDIAN PRESS UNION

Indian Press Union (IPU) A National Platform for Journalists and Media Professionals.

© 2026 All Rights Reserved IPU MEDIA ASSOCIATION