BRICS शिखर सम्मेलन और भारतीय राजनीति: वैश्विक मंच से उठते घरेलू सवाल
BRICS शिखर सम्मेलन और भारतीय राजनीति: वैश्विक मंच से उठते घरेलू सवाल
लेखिका: डॉ. निधि श्रीवास्तव
नई दिल्ली: नई दिल्ली में आयोजित 18वें BRICS शिखर सम्मेलन ने भारत की विदेश नीति, वैश्विक कूटनीति और घरेलू राजनीतिक विमर्श को एक साथ चर्चा के केंद्र में ला दिया। भारत की अध्यक्षता में हुआ यह सम्मेलन ऐसे समय आयोजित हुआ, जब वैश्विक राजनीति और आर्थिक व्यवस्था में लगातार बदलाव देखने को मिल रहे हैं। BRICS अब उभरती अर्थव्यवस्थाओं के सहयोग के साथ-साथ ग्लोबल साउथ से जुड़े मुद्दों पर चर्चा का एक महत्वपूर्ण मंच बन चुका है।
भारत के लिए इस मंच का महत्व इसलिए भी है क्योंकि उसे अमेरिका और यूरोप के साथ अपने आर्थिक एवं रणनीतिक संबंधों को आगे बढ़ाते हुए रूस और चीन जैसे BRICS सदस्य देशों के साथ भी संवाद बनाए रखना है। भारत-चीन संबंधों में मौजूद मतभेदों के बीच दोनों देशों के नेतृत्व के बीच संवाद यह दर्शाता है कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में राष्ट्रीय हित और रणनीतिक प्राथमिकताएं महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
BRICS शिखर सम्मेलन में आतंकवाद, वैश्विक व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वास्थ्य और विकास सहित कई मुद्दों पर चर्चा हुई। नई दिल्ली घोषणा में आतंकवाद के खिलाफ सहयोग और वैश्विक शासन व्यवस्था में सुधार जैसे विषयों को भी स्थान मिला। भारत के लिए आतंकवाद से जुड़े मुद्दों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाना उसकी विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।
BRICS और घरेलू राजनीतिक विमर्श
किसी भी लोकतंत्र में सरकार की उपलब्धियों के साथ विपक्ष की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है। BRICS सम्मेलन को लेकर भारतीय राजनीति में भी अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आए। सत्ता पक्ष ने सम्मेलन को भारत की वैश्विक कूटनीतिक भूमिका के संदर्भ में महत्वपूर्ण बताया, जबकि विपक्ष के कुछ नेताओं ने BRICS से मिलने वाले व्यावहारिक और दीर्घकालिक लाभों पर सवाल उठाए।
कांग्रेस नेता शशि थरूर ने BRICS की भारत में मेजबानी को महत्वपूर्ण बताया, जबकि पी. चिदंबरम ने हाल के BRICS सम्मेलनों से मिलने वाले ठोस लाभों पर सवाल उठाए। इन अलग-अलग विचारों से यह स्पष्ट होता है कि विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय मंचों की उपयोगिता को लेकर राजनीतिक दलों के भीतर भी अलग-अलग दृष्टिकोण हो सकते हैं।
विदेश नीति और राष्ट्रीय हित
यह प्रश्न महत्वपूर्ण है कि विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे विषयों पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच मतभेदों के बावजूद राष्ट्रीय हित को किस तरह प्राथमिकता दी जाए। लोकतंत्र में विपक्ष का दायित्व केवल सरकार की आलोचना करना नहीं, बल्कि नीतियों और फैसलों पर सवाल उठाना भी है।
यदि सरकार किसी अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन को भारत की उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करती है, तो विपक्ष के लिए यह पूछना स्वाभाविक है कि इससे व्यापार, निवेश, रोजगार, तकनीकी सहयोग और ऊर्जा सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में भारत को क्या ठोस लाभ मिल सकता है। दूसरी ओर, ऐसे सवालों की चर्चा तथ्यों और नीतिगत विकल्पों के आधार पर होना अधिक उपयोगी हो सकता है।
राजनीतिक बहस और छोटे मुद्दे
BRICS के संदर्भ में सम्मेलन के भोजन के मेन्यू जैसे अपेक्षाकृत छोटे मुद्दे भी घरेलू राजनीतिक चर्चा का हिस्सा बने। राहुल गांधी की सम्मेलन के शाकाहारी डिनर को लेकर टिप्पणी के बाद सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आईं।
ऐसे प्रसंग यह सवाल उठाते हैं कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति से जुड़े आयोजनों पर घरेलू राजनीतिक बहस का दायरा कितना व्यापक होना चाहिए। राजनीतिक दलों के लिए अलग-अलग विषयों पर अपनी राय रखना स्वाभाविक है, लेकिन वैश्विक मंचों से जुड़े मुद्दों पर चर्चा में व्यापक राष्ट्रीय और रणनीतिक पहलुओं को भी महत्व दिया जा सकता है।
BRICS की चुनौतियां और भारत की स्थिति
BRICS के सदस्य देशों के राजनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक हित हमेशा समान नहीं होते। भारत के चीन के साथ सीमा और रणनीतिक मुद्दे हैं, रूस के साथ उसके लंबे समय से संबंध हैं और पश्चिमी देशों के साथ व्यापार तथा तकनीकी सहयोग भी महत्वपूर्ण है। ऐसे में भारत के लिए BRICS को व्यावहारिक सहयोग के मंच के रूप में उपयोग करना उसकी बहुस्तरीय विदेश नीति का एक हिस्सा हो सकता है।
भारत के लिए BRICS की उपयोगिता का आकलन केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि उनके आधार पर होने वाले वास्तविक सहयोग से किया जा सकता है। व्यापार, स्थानीय मुद्राओं में लेन-देन, डिजिटल तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वास्थ्य, शिक्षा, ऊर्जा, जलवायु अनुकूलन और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में ठोस सहयोग इसके प्रभाव को समझने का आधार बन सकता है।
विपक्ष की रचनात्मक भूमिका
विपक्ष की भूमिका इस संदर्भ में अधिक रचनात्मक हो सकती है। विपक्ष यह सवाल उठा सकता है कि BRICS के माध्यम से भारत के लिए कौन से लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं, उनकी समयसीमा क्या है और उनके परिणामों का मूल्यांकन किस प्रकार किया जाएगा। सरकार के लिए भी इन सवालों को लोकतांत्रिक जवाबदेही के हिस्से के रूप में लेना महत्वपूर्ण हो सकता है।
आज भारतीय राजनीति में विदेश नीति धीरे-धीरे घरेलू राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन रही है। वैश्विक अर्थव्यवस्था का असर रोजगार, निर्यात, ऊर्जा, तकनीक, शिक्षा और निवेश जैसे क्षेत्रों के माध्यम से आम नागरिकों तक पहुंचता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर होने वाली राजनीतिक बहस का घरेलू प्रभाव भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
BRICS को लेकर आगे की दिशा
BRICS सम्मेलन को केवल सरकार की सफलता या विपक्ष की आलोचना के नजरिए से देखना पर्याप्त नहीं होगा। इसे भारत की दीर्घकालिक रणनीतिक क्षमता और आर्थिक हितों के संदर्भ में भी देखा जा सकता है। सत्ता पक्ष को अपनी उपलब्धियों के साथ ठोस परिणामों पर चर्चा करनी होगी, जबकि विपक्ष के लिए आलोचना के साथ वैकल्पिक नीतिगत दृष्टिकोण सामने रखना उपयोगी होगा।
BRICS भारत के लिए आर्थिक, तकनीकी और कूटनीतिक सहयोग बढ़ाने का एक अवसर है। इस अवसर का वास्तविक प्रभाव आने वाले समय में व्यापार, निवेश, तकनीकी सहयोग और अन्य क्षेत्रों में सामने आने वाले परिणामों से आंका जा सकेगा।
अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की भूमिका जितनी महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि देश के भीतर विदेश नीति पर तथ्य आधारित, जिम्मेदार और व्यापक लोकतांत्रिक संवाद हो। अलग-अलग राजनीतिक दृष्टिकोण लोकतंत्र का हिस्सा हैं, लेकिन उन्हें राष्ट्रीय हित और सार्वजनिक जवाबदेही के व्यापक संदर्भ में रखना नीति संबंधी चर्चा को अधिक सार्थक बना सकता है।