जनता दरबार का सीधा संदेश: निचले प्रशासनिक तंत्र की ढिलाई पर जिला नेतृत्व का कड़ा रुख,
जनता दरबार का सीधा संदेश:
निचले प्रशासनिक तंत्र की ढिलाई पर जिला नेतृत्व का कड़ा रुख,
विजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार
गयाजी। जनता दरबार केवल शिकायतें दर्ज करने का कोई औपचारिक मंच या प्रशासनिक रस्म अदायगी नहीं है, बल्कि यह निचले प्रशासनिक तंत्र की वास्तविक कार्यप्रणाली और दक्षता का आईना होता है।
गयाजी में आयोजित जिलाधिकारी के जनता दरबार में उमड़ी फरियादियों की भीड़ और सामने आए मुद्दों का दायरा—विशेष रूप से भूमि विवाद और सामाजिक सुरक्षा पेंशन से जुड़ी जटिल समस्याएँ—यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि अंचल और प्रखंड स्तर पर आम नागरिकों को अपने जायज हक के लिए आज भी अनावश्यक चक्कर काटने पड़ रहे हैं।
निचले तंत्र पर उठते सवाल :
ग्रामीण क्षेत्रों में भूमि विवाद न केवल कानून-व्यवस्था के लिए चुनौती बनते हैं, बल्कि सामाजिक सौहार्द को भी छिन्न-भिन्न करते हैं।
पंचायत और ब्लॉक स्तर के अधिकारियों द्वारा समय पर मामलों का निष्पक्ष निष्पादन न करने का ही परिणाम है कि आम ग्रामीणों को अपनी छोटी-छोटी शिकायतों के निवारण हेतु जिला मुख्यालय तक दौड़ना पड़ता है।
जनता दरबार में भारी संख्या में आवेदकों की उपस्थिति स्थानीय सीओ, बीडीओ और संबंधित कर्मचारियों की कार्यशैली पर एक प्रत्यक्ष प्रश्नचिह्न खड़ा करती है।
समयबद्ध समाधान और जवाबदेही की दरकार
जिलाधिकारी शशांक शुभांकर द्वारा स्वयं प्रत्येक आवेदक की बात गंभीरता से सुनना और संबंधित अधिकारियों को मौके पर ही 'टाइम-बाउंड' (समयबद्ध) निस्तारण का कड़ा निर्देश देना यह साबित करता है कि जिला नेतृत्व अब किसी भी स्तर पर शिथिलता बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है।
केवल आवेदन स्वीकार कर लेना ही समाधान नहीं है; जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक पारदर्शी सुशासन का लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सकता।
"प्रशासनिक जवाबदेही का असली परीक्षण फाइलों के पन्नों पर नहीं, बल्कि धरातल पर आम नागरिक को मिलने वाले त्वरित न्याय और राहत से होता है।"
विश्वास की बहाली और भावी चुनौती :
जिलाधिकारी का यह जन-केंद्रित और सख्त रवैया निश्चित तौर पर आम नागरिकों के मन में सुशासन के प्रति विश्वास को पुनर्जाग्रत करता है।
अब पूरा दारोमदार निचले और अधीनस्थ अधिकारियों पर है कि वे इन निर्देशों को महज कागजी औपचारिकताओं तक सीमित न रखकर, धरातल पर परिणाम लाकर दिखाएं।
यदि पंचायत और अंचल स्तर पर ही समस्याओं का पारदर्शी समाधान होने लगे, तो जनता दरबार का असली उद्देश्य साकार होगा।