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बड़ा फैसला : "पूरा काम तो पूरा वेतन क्यों नहीं?" — मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने 70-80-90% वेतन कटौती फार्मूला किया अवैध घोषित,

By VIJAY KUMAR • 2026-09-11 04:23 • 2 views   Share WhatsApp Share Facebook Share X
बड़ा फैसला : "पूरा काम तो पूरा वेतन क्यों नहीं?" — मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने 70-80-90% वेतन कटौती फार्मूला किया अवैध घोषित,

प्रोबेशन अवधि में कम वेतन पर MP हाईकोर्ट का फैसला, समानता के सिद्धांत पर उठे अहम सवाल

लेखक: विजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार

सत्यमेव जयते

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने सरकारी कर्मचारियों को प्रोबेशन अवधि में कम वेतन दिए जाने से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की पीठ ने राज्य सरकार की उस व्यवस्था पर सवाल उठाया, जिसके तहत नए सरकारी कर्मचारियों को प्रोबेशन के तीन वर्षों में क्रमशः 70 प्रतिशत, 80 प्रतिशत और 90 प्रतिशत वेतन दिए जाने का प्रावधान था।

अदालत के फैसले में पद के अनुरूप कार्य लेने और उसके बदले मिलने वाले वेतन से जुड़े संवैधानिक पहलुओं पर विचार किया गया। यह फैसला मुख्य रूप से मध्य प्रदेश में लागू संबंधित सेवा शर्तों से जुड़ा है। हालांकि, इसके व्यापक कानूनी प्रभाव और अन्य राज्यों में समान परिस्थितियों वाले मामलों पर संभावित असर को संबंधित सेवा नियमों और न्यायिक निर्णयों के आधार पर अलग-अलग देखा जाना होगा।

समान काम और वेतन से जुड़ा संवैधानिक सिद्धांत

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता की बात करता है, जबकि अनुच्छेद 39(घ) राज्य की नीति के निदेशक तत्वों में समान कार्य के लिए समान वेतन का उल्लेख करता है। सर्वोच्च न्यायालय ने अलग-अलग मामलों में समान काम और वेतन से जुड़े सिद्धांतों पर विचार किया है।

हालांकि, किसी कर्मचारी को समान वेतन का अधिकार स्वतः केवल इस आधार पर नहीं मिल जाता कि वह समान प्रकृति का काम कर रहा है। नियुक्ति की प्रकृति, योग्यता, जिम्मेदारी, सेवा नियम और संबंधित पद की शर्तों जैसे पहलुओं का भी न्यायिक परीक्षण किया जाता है।

MP हाईकोर्ट के फैसले का संदर्भ

मध्य प्रदेश में नए सरकारी कर्मचारियों के लिए लागू 70 प्रतिशत, 80 प्रतिशत और 90 प्रतिशत भुगतान की व्यवस्था को अदालत में चुनौती दी गई थी। मामले में यह सवाल प्रमुख था कि निर्धारित पद और जिम्मेदारियों के अनुरूप काम लेने के बावजूद प्रोबेशन अवधि में कम वेतन देने की व्यवस्था संवैधानिक कसौटी पर टिकती है या नहीं।

डिवीजन बेंच ने संबंधित व्यवस्था को असंवैधानिक और भेदभावपूर्ण मानते हुए कर्मचारियों के वेतन से जुड़े प्रावधानों पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। फैसले का प्रभाव संबंधित मध्य प्रदेश सेवा नियमों और मामले में शामिल कर्मचारियों के संदर्भ में समझा जाना चाहिए।

बिहार के संदर्भ में क्यों महत्वपूर्ण?

इस फैसले के बाद बिहार सहित अन्य राज्यों में संविदा, नियोजित और अन्य श्रेणी के कर्मचारियों के वेतन तथा सेवा शर्तों को लेकर चल रही बहस पर भी ध्यान गया है। हालांकि, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का फैसला बिहार के कर्मचारियों पर स्वतः लागू नहीं होता। बिहार में किसी समान मामले का कानूनी परिणाम वहां लागू सेवा नियमों और संबंधित न्यायिक आदेशों पर निर्भर करेगा।

बिहार में संविदा और नियोजित शिक्षकों तथा अन्य कर्मचारियों के वेतन से जुड़े अलग-अलग मामले पहले से सामने आते रहे हैं। ऐसे मामलों की तुलना MP हाईकोर्ट के फैसले से करते समय दोनों राज्यों के नियमों और नियुक्ति की शर्तों को अलग-अलग देखना जरूरी होगा।

शांति कुमारी के मामले का संदर्भ

गया के शेरघाटी क्षेत्र की सहायक शिक्षिका शांति कुमारी से जुड़े लंबित वेतन मामले का भी इस संदर्भ में उल्लेख किया गया है। हालांकि, उनका मामला प्रोबेशन अवधि में 70-80-90 प्रतिशत वेतन दिए जाने वाले मध्य प्रदेश के मामले से अलग है। इसलिए दोनों मामलों को समान कानूनी श्रेणी में रखना उचित नहीं होगा।

शांति कुमारी के मामले में लंबे समय से वेतन भुगतान नहीं होने के दावे की स्वतंत्र रूप से संबंधित विभागीय और न्यायिक रिकॉर्ड से पुष्टि किया जाना आवश्यक है। यदि मामला न्यायालय में लंबित है, तो उसके परिणाम का निर्धारण संबंधित न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर होगा।

आगे की दिशा

MP हाईकोर्ट के फैसले के बाद सरकारी कर्मचारियों की नियुक्ति, प्रोबेशन अवधि और वेतन निर्धारण से जुड़े नियमों पर चर्चा बढ़ सकती है। हालांकि, किसी राज्य में समान नीति या व्यवस्था की वैधता का निर्धारण संबंधित कानून, सेवा नियम और न्यायिक परिस्थितियों के आधार पर ही किया जा सकता है।

बिहार में भी संविदा और अन्य श्रेणी के कर्मचारियों के वेतन से जुड़े मामलों में पारदर्शिता, स्पष्ट सेवा शर्तों और समयबद्ध शिकायत निवारण की आवश्यकता पर चर्चा की जा सकती है।

निष्कर्ष

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का फैसला प्रोबेशन अवधि में वेतन निर्धारण और समानता के संवैधानिक सिद्धांत से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नों को सामने लाता है। हालांकि, इसे पूरे देश में समान परिस्थितियों पर स्वतः लागू होने वाला आदेश मानना उचित नहीं होगा। अन्य राज्यों में समान मामलों की स्थिति वहां के सेवा नियमों और संबंधित न्यायिक फैसलों के आधार पर तय होगी।

नोट: लेख में बिहार और शांति कुमारी से जुड़े संदर्भों को व्यापक कानूनी निष्कर्ष के रूप में नहीं, बल्कि अलग परिस्थितियों वाले मामलों के संदर्भ के रूप में देखा जाना चाहिए।

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