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पर्युषण पर्व: आत्मशुद्धि, क्षमा और संयम का संदेश देने वाला जैन पर्व

By RAJAT MALHOTRA • 2026-09-19 04:23 • 3 views   Share WhatsApp Share Facebook Share X
पर्युषण पर्व: आत्मशुद्धि, क्षमा और संयम का संदेश देने वाला जैन पर्व

पर्युषण पर्व: आत्मचिंतन, क्षमा, अहिंसा और संयम का संदेश

जैन समाज का महत्वपूर्ण धार्मिक पर्व पर्युषण आत्मचिंतन, संयम, तप, त्याग और क्षमा की भावना से जुड़ा है। जैन परंपरा में इसे केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं माना जाता, बल्कि यह व्यक्ति को अपने आचरण की समीक्षा करने तथा अहिंसा और सद्भाव को जीवन में महत्व देने का अवसर माना जाता है। इस दौरान जैन समुदाय के लोग पूजा-पाठ, स्वाध्याय, ध्यान, उपवास और धार्मिक प्रवचनों में भाग लेते हैं।

क्यों मनाया जाता है पर्युषण पर्व?

‘पर्युषण’ का संबंध आत्मा के निकट रहने और कुछ समय के लिए सांसारिक गतिविधियों से विराम लेकर आत्मनिरीक्षण करने की भावना से जोड़ा जाता है। जैन दर्शन में कर्म सिद्धांत और आत्मशुद्धि को विशेष महत्व दिया गया है। इसी दृष्टि से पर्युषण के दौरान व्यक्ति अपने विचारों, वाणी और कर्मों पर विचार करता है तथा जाने-अनजाने हुई गलतियों के लिए प्रायश्चित की भावना रखता है।

यह पर्व जैन धर्म के दोनों प्रमुख संप्रदायों—श्वेतांबर और दिगंबर—में धार्मिक महत्व रखता है। हालांकि, पर्व की अवधि और कुछ परंपराओं में अंतर होता है। श्वेतांबर परंपरा में पर्युषण सामान्यतः आठ दिनों तक मनाया जाता है, जबकि दिगंबर परंपरा में दस दिवसीय दशलक्षण पर्व का विशेष महत्व है।

क्षमा और आत्मचिंतन का पर्व

पर्युषण से जुड़ी प्रमुख परंपराओं में क्षमा का विशेष स्थान है। पर्व के समापन पर जैन समुदाय में ‘क्षमावाणी’ या ‘क्षमा पर्व’ मनाने की परंपरा है। इस अवसर पर लोग मन, वचन और कर्म से हुई भूलों के लिए एक-दूसरे से क्षमा मांगते हैं और दूसरों को क्षमा करने की भावना रखते हैं।

‘मिच्छामि दुक्कडम्’ की भावना भी इसी परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसका व्यापक आशय जाने-अनजाने हुई गलतियों के लिए क्षमा मांगने और भविष्य में बेहतर आचरण का संकल्प लेने से जुड़ा है।

उपवास, संयम और धार्मिक साधना

पर्युषण के दौरान अनेक श्रद्धालु अपनी क्षमता और धार्मिक परंपरा के अनुसार उपवास तथा अन्य तप करते हैं। कुछ लोग एक समय भोजन करते हैं, जबकि कुछ श्रद्धालु कई दिनों तक उपवास रखते हैं। तप और उपवास का स्वरूप व्यक्ति की शारीरिक क्षमता और धार्मिक आस्था के अनुसार अलग-अलग हो सकता है।

इस अवधि में जैन मंदिरों और उपाश्रयों में धार्मिक प्रवचन, स्वाध्याय और पूजा-अर्चना का आयोजन किया जाता है। श्वेतांबर परंपरा में कल्पसूत्र के पाठ का विशेष महत्व माना जाता है। भगवान महावीर के जीवन और उपदेशों का स्मरण भी पर्व से जुड़े धार्मिक कार्यक्रमों का हिस्सा होता है।

अहिंसा और संयम का संदेश

जैन दर्शन में अहिंसा का केंद्रीय स्थान है। पर्युषण के दौरान जीवों के प्रति करुणा, संयमित जीवन और अनावश्यक हिंसा से बचने की भावना पर जोर दिया जाता है। सीमित उपभोग और आत्मसंयम जैसे विचार भी इस पर्व की धार्मिक परंपराओं से जुड़े हैं।

आधुनिक जीवन में बढ़ते उपभोग और तनाव के बीच संयमित जीवनशैली तथा आत्मचिंतन की चर्चा भी प्रासंगिक मानी जाती है। पर्युषण व्यक्ति को बाहरी गतिविधियों के साथ अपने आचरण और आंतरिक शांति पर ध्यान देने का अवसर प्रदान करता है।

सांस्कृतिक महत्व

पर्युषण जैन समाज की धार्मिक पहचान के साथ उसकी सांस्कृतिक परंपराओं को बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। परिवारों में बच्चों को जैन सिद्धांतों, तीर्थंकरों के जीवन और धार्मिक मूल्यों से परिचित कराया जाता है। सामूहिक धार्मिक कार्यक्रमों के माध्यम से समुदाय के बीच सामाजिक संपर्क और सहयोग की भावना भी विकसित होती है।

इस प्रकार पर्युषण केवल पूजा और उपवास तक सीमित पर्व नहीं है, बल्कि आत्मनिरीक्षण, क्षमा, अहिंसा, संयम और बेहतर आचरण के संकल्प से जुड़ा अवसर है। इसकी परंपराएं व्यक्ति को अपने व्यवहार पर विचार करने और सामाजिक जीवन में सद्भाव को महत्व देने का संदेश देती हैं।

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