5 साल का इंतज़ार, खाकी की पुरानी चूक और SIT का प्रहार: बेगूसराय के रिंकू कुमारी हत्याकांड में कैसे हुई न्याय की वापसी?
5 साल का इंतज़ार, खाकी की पुरानी चूक और SIT का प्रहार:
बेगूसराय के रिंकू कुमारी हत्याकांड में कैसे हुई न्याय की वापसी?
विजय कुमार वरिष्ठ पत्रकार
गयाजी : न्याय की चक्की भले ही धीमी पीसती है, लेकिन जब वह पीसती है, तो सच के सारे रेशे खोल कर रख देती है। बेगूसराय के वीरपुर स्थित कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय की वार्डन रिंकू कुमारी की मौत का मामला इसका जीता-जागता उदाहरण है।
2021 में जिस मामले को पुलिस ने 'तथ्य की भूल' बताकर ठंडे बस्ते में डाल दिया था, 2026 में पटना उच्च न्यायालय के एक झटके और SIT की वैज्ञानिक जांच ने उसे एक सुनियोजित हत्या के रूप में बेनकाब कर दिया है।
यह कहानी सिर्फ एक कत्ल की नहीं है, बल्कि एक बेटी के पांच साल के लंबे संघर्ष और पुलिसिया तंत्र की उस पुरानी कार्यप्रणाली की भी है, जो पहले सच्चाई को दफ्न करती है और फिर अदालत के डंडे के बाद उसे ही खोदकर निकालती है।
क्या था मामला और कैसे हुई थी लीपापोती?
4 अप्रैल 2021 — कोरोनाकाल का वही दौर, जब स्कूल बंद थे, मगर कस्तूरबा गांधी बालिका आवासीय विद्यालय, मुजफ्फरा (थाना-बीरपुर, जिला-बेगूसराय) की वार्डन रिंकू कुमारी ड्यूटी पर पहुँची थीं।
उसी दोपहर एक बजे विद्यालय के एक कमरे में उनका शव पंखे से झूलता मिला।
स्थानीय पुलिस ने न ढंग से जांच की, न पोस्टमार्टम पूरा कराया — रिपोर्ट में सिर्फ इतना दर्ज हुआ कि ‘सांस रुकने से मौत हुई’। घटनास्थल पर फोरेंसिक टीम तक समय पर नहीं बुलाई गई, और जब बुलाई गई तो उसकी राय को दरकिनार कर दिया गया।
31 अक्टूबर 2021 को मामले को ‘तथ्य की भूल’ बताकर क्लोज़र रिपोर्ट अदालत में समर्पित कर दी गई — यानी पुलिस ने पहले ही दिन से केस का फैसला कर लिया था।
मृतका की तीन बेटियाँ — तेजस्विनी उर्फ मोनी, चेतना और सबसे छोटी लूसी — इस फैसले को मानने को तैयार नहीं थीं। उनका कहना था कि जो माँ अपनी तीन बेटियों को अनाथ छोड़कर आत्महत्या कभी नहीं कर सकती, उसे व्यवस्था ने ‘आत्महत्या करने वाली’ करार दे दिया।
एक ओर कॉलेज की पढ़ाई, दूसरी ओर इंसाफ की लड़ाई — पाँच साल तक तीनों बहनें थाने-दर-थाने, अफसर-दर-अफसर की चौखट पर गुहार लगाती रहीं।
बेगूसराय की निचली अदालत ने भी बिना ठोस सुनवाई के पुलिस की जांच को सही मान लिया। अंततः तीनों बहनों ने पटना हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।
पटना हाईकोर्ट का ऐतिहासिक हस्तक्षेप :
08 अप्रैल 2026 को पटना हाईकोर्ट ने Cr.W.J.C. No.-259/2022 में एक असाधारण आदेश पारित किया — सामान्यतः अदालतें ऐसे मामलों में SIT, CID या न्यायिक आयोग गठित करने का सामान्य निर्देश देती हैं, लेकिन यहाँ अदालत ने सीधे नाम लेकर IG मगध रेंज विकास वैभव को मामले की de novo (नए सिरे से) जांच सौंपी और उन्हें ही अपनी टीम गठित करने का अधिकार दिया।
यह अपने आप में इस बात का प्रमाण है कि अदालत को स्थानीय पुलिस व निचली अदालत, दोनों की कार्यप्रणाली पर भरोसा नहीं रहा।
“ जो सच पाँच साल तक तीन अनाथ बेटियाँ चीख-चीख कर कहती रहीं, वह सच पुलिस की फाइलों में ‘आत्महत्या’ बनकर दब गया था। ”
SIT जांच के प्रमुख निष्कर्ष :
1. पूर्व अभिलेखों की समीक्षा में पाया गया कि घटनास्थल की फोटोग्राफी/वीडियोग्राफी का उल्लेख तो था, लेकिन सामग्री केस अभिलेख में संलग्न ही नहीं थी।
2.घटना के दिन विद्यालय का CCTV ठीक डेढ़ घंटे के लिए ‘खराब’ हुआ — उतनी ही अवधि में जब वारदात हुई — और उसके बाद अपने-आप ठीक हो गया।
3. स्वतंत्र प्रत्यक्षदर्शियों ने मृतका को कौशल कुमार के साथ मोटरसाइकिल पर बेगूसराय की ओर जाते देखे जाने की पुष्टि की।
4. फोरेंसिक व मेडिकल पुनर्मूल्यांकन में गर्दन पर ligature mark/abrasion मिले, जिससे केवल hanging नहीं बल्कि strangulation (गला घोंटने) की प्रबल संभावना सामने आई — मेडिकल बोर्ड ने भी asphyxia के साथ strangulation से इनकार न किए जाने की राय दी।
5. मृतका की नोटबुक और कथित पत्र की हस्तलिपि, विधि-विज्ञान प्रयोगशाला, पटना से मिलान में मृतका की ही हस्तलिपि निकली — यानी धन-वापसी को लेकर विवाद खुद मृतका के हाथ से लिखे दस्तावेज़ों में दर्ज था।
6. 15 लाख रूपये के भूमि/नकद लेन-देन में मृतका द्वारा कौशल कुमार पर लगातार दबाव बनाए जाने की बात कई गवाहों के बयान में सामने आई — घटना से एक दिन पहले भूमि दिखाई गई थी और अगली सुबह राशि/भूमि सौंपने की बात तय हुई थी।
7. विद्यालय के केयरटेकर अजीत कुमार उर्फ बबलू पर CCTV बंद करने व मुख्य द्वार पर मृतका को रोकने के आरोप में संलिप्तता स्थापित हुई।
8. कौशल कुमार के भाई रोहित कुमार की भी जांच हुई, परंतु पर्याप्त साक्ष्य न मिलने पर उसे आरोपित नहीं किया गया।
9. 29 जुलाई 2026 को दोनों अभियुक्तों — कौशल कुमार व अजीत कुमार उर्फ बबलू — की गिरफ्तारी हुई; 16 सितंबर 2026 को धारा 302/34 भा0द0वि0 के तहत आरोप-पत्र संख्या 181/26 न्यायालय में समर्पित किया गया।
पुरानी जांच की चूकें : जवाबदेही का सवाल,
SIT की अपनी समीक्षा में यह स्वीकार किया गया कि प्राथमिक जांच में अभियुक्तों के नाम दर्ज करने से जुड़ी परिस्थितियां संदिग्ध रहीं, घटनास्थल की CCTV फुटेज की जब्ती व परीक्षण विधिवत नहीं हुआ, रस्सी की जब्ती ठीक से नहीं हुई, मृतका का मोबाइल जब्ती सूची के बिना ही पुलिस अभिरक्षा में रखा गया, फोरेंसिक रिपोर्ट में strangulation के संकेत के बावजूद उस दिशा में पर्याप्त अनुसंधान नहीं हुआ।
इसी आधार पर पूर्व थानाध्यक्ष सह अनुसंधानकर्ता के विरुद्ध प्रशासनिक कार्रवाई की अनुशंसा SIT ने स्वयं की है।
यह सिर्फ एक थाने की लापरवाही का मामला नहीं है — यह उस पूरी व्यवस्था पर सवाल है, जिसमें एक विधवा महिला की संदिग्ध मौत को बिना गंभीरता के ‘आत्महत्या’ का ठप्पा लगाकर फाइल बंद कर दी गई, और तीन नाबालिग/किशोर बेटियों को पाँच साल तक न्याय के लिए दर-दर भटकना पड़ा।
ज़मीनी सवाल :
1. यदि पटना हाईकोर्ट स्वयं हस्तक्षेप न करता और सीधे एक IPS अधिकारी को न भेजता, तो क्या यह मामला हमेशा के लिए ‘आत्महत्या’ की फाइल में दफन नहीं रह जाता?
2. जिस डेढ़ घंटे में CCTV ‘खराब’ हुआ, ठीक उसी अवधि में वारदात होने के ‘संयोग’ पर पहले दिन से जांच एजेंसी की नज़र क्यों नहीं गई?
3. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में strangulation के संकेत मौजूद होने के बावजूद पांच साल तक उस दिशा में जांच क्यों नहीं बढ़ाई गई — क्या यह लापरवाही थी या जानबूझकर की गई अनदेखी?
4. तीन अनाथ बेटियों को इंसाफ के लिए निचली अदालत तक जो नाउम्मीदी झेलनी पड़ी, उसकी जवाबदेही किस स्तर पर तय होगी?
5. तीसरे अज्ञात अभियुक्त की भूमिका आज भी अनिर्णीत है — क्या पाँच वर्ष बीत जाने के कारण यह पहलू सदा के लिए अनुत्तरित रह जाएगा?
जनता की मांगें :
1. प्रारंभिक जांच में लापरवाही बरतने वाले तत्कालीन थानाध्यक्ष व अनुसंधानकर्ता के विरुद्ध केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि विभागीय अनुशासनिक कार्रवाई सार्वजनिक रूप से पारदर्शी ढंग से पूरी की जाए।
2. पूर्व पोस्टमार्टम करने वाले चिकित्सकीय दल की भूमिका की भी स्वतंत्र जांच हो, क्योंकि प्रारंभिक रिपोर्ट में strangulation के संकेतों की अनदेखी हुई।
3. तीसरे अज्ञात अभियुक्त की पहचान हेतु जांच खुली रखते हुए इसे ससमय निष्कर्ष तक पहुँचाया जाए, ताकि न्याय अधूरा न रह जाए।
4. मृतका की तीनों बेटियों को त्वरित सुनवाई व सुरक्षा सुनिश्चित की जाए, ताकि विचारण के दौरान गवाहों व पीड़ित परिवार पर किसी प्रकार का दबाव न बने।
5. इस मामले को एक मिसाल के रूप में लेते हुए बिहार पुलिस मुख्यालय राज्यभर में लंबित ‘संदिग्ध आत्महत्या’ वर्गीकृत मामलों की समयबद्ध पुनर्समीक्षा नीति बनाए।
टिप्पणी :
रिंकू कुमारी की कहानी सिर्फ एक हत्या के खुलासे की कहानी नहीं है — यह उस व्यवस्था की कहानी है, जो कमज़ोर, असहाय और अकेली महिलाओं की मौत को बिना गंभीरता के फाइलों में दफन कर देती है।
यह तीन बेटियों की उस जिद की कहानी है, जिसने साबित किया कि सच को दबाया तो जा सकता है, मिटाया नहीं जा सकता।
सवाल अब सिर्फ कौशल कुमार और अजीत कुमार उर्फ बबलू के विचारण तक सीमित नहीं है — सवाल यह है कि आखिर कितनी ‘रिंकू कुमारियां’ आज भी किसी बंद फाइल में ‘आत्महत्या’ बनकर दबी पड़ी हैं, और उनके इंसाफ के लिए कोई हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाने वाला नहीं है।