वंदे मातरम को लेकर रवींद्रनाथ टैगोर की क्या राय थी, उन्होंने कांग्रेस से क्या कहा था?
वंदे मातरम के पहले दो पदों पर कांग्रेस का फैसला और उससे जुड़ा ऐतिहासिक संदर्भ
कांग्रेस वर्किंग कमिटी (सीडब्ल्यूसी) ने फैसला किया है कि पार्टी के कार्यक्रमों में 'वंदे मातरम' के केवल पहले दो पद ही गाए जाएंगे। यह फैसला स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रम और बाद में गोवा में हुए एक कार्यक्रम में राष्ट्रगीत के गायन को लेकर उठे राजनीतिक विवाद के बीच लिया गया है।
कांग्रेस ने 1937 में सीडब्ल्यूसी द्वारा पारित प्रस्ताव का हवाला दिया है। पार्टी का कहना है कि स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख नेताओं, जिनमें महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ टैगोर शामिल थे, ने सार्वजनिक कार्यक्रमों में वंदे मातरम के केवल पहले दो पद गाए जाने का समर्थन किया था।
वंदे मातरम के बाकी पदों में हिंदू देवी-देवताओं, जिनमें दुर्गा, सरस्वती और लक्ष्मी के संदर्भ शामिल हैं, तथा भारत को एक पूजनीय देवी के रूप में प्रस्तुत करने वाले वर्णन मिलते हैं।
यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है, जब वंदे मातरम को लेकर राजनीतिक और ऐतिहासिक बहस फिर से चर्चा में है।
रवींद्रनाथ टैगोर क्या सोचते थे?
इतिहासकार मृदुला मुखर्जी ने पिछले साल 11 दिसंबर को द वायर के लिए वरिष्ठ पत्रकार करण थापर को दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि बंगाल में स्वदेशी और बंग-भंग विरोधी आंदोलनों के दौरान टैगोर ने वंदे मातरम को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
मृदुला मुखर्जी के अनुसार, जब कांग्रेस में गीत को लेकर सवाल उठे तो आपत्तियों पर विचार करने के लिए एक उपसमिति बनाई गई और उसने टैगोर से सलाह ली। टैगोर ने जवाहरलाल नेहरू को लिखे पत्र में कहा था कि मूल कविता के संदर्भ को देखते हुए उसके कुछ हिस्सों की व्याख्या इस तरह की जा सकती है, जिससे मुस्लिम भावनाएं आहत हो सकती हैं।
टैगोर का मानना था कि राष्ट्रीय गीत के रूप में इस्तेमाल किए जाने वाले पहले दो पदों की अपनी अलग पहचान और प्रेरणादायक महत्व विकसित हो चुका था और उनमें किसी समुदाय के लिए आपत्तिजनक तत्व नहीं थे।
साहित्य अकादमी से 1994 में प्रकाशित The English Writings of Rabindranath Tagore: A Miscellany में भी वंदे मातरम को लेकर टैगोर की टिप्पणी का उल्लेख मिलता है।
ऐतिहासिक पत्राचार के संदर्भ में यह भी बताया गया है कि सुभाष चंद्र बोस ने टैगोर से वंदे मातरम के मुद्दे को महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के सामने उठाने का अनुरोध किया था।
1937 में कांग्रेस वर्किंग कमिटी में क्या हुआ था?
30 अक्तूबर 1937 को कलकत्ता (अब कोलकाता) में कांग्रेस वर्किंग कमिटी की बैठक हुई थी। बैठक की अध्यक्षता जवाहरलाल नेहरू ने की थी। इसमें सरदार वल्लभभाई पटेल, राजेंद्र प्रसाद, मौलाना अबुल कलाम आजाद, भूलाभाई देसाई, जमनालाल बजाज, आचार्य जे.बी. कृपलानी, पट्टाभि सीतारमैया, राजाजी, आचार्य नरेंद्र देव, जयप्रकाश नारायण और सुभाष चंद्र बोस समेत कांग्रेस के कई प्रमुख नेता मौजूद थे।
मद्रास हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस के. चंद्रु ने द हिन्दू में प्रकाशित एक लेख में 1937 के सीडब्ल्यूसी प्रस्ताव का उल्लेख किया था। उनके अनुसार, महात्मा गांधी सीडब्ल्यूसी के सदस्य नहीं थे, लेकिन विशेष आमंत्रित के रूप में बैठक में शामिल हुए थे।
जस्टिस चंद्रु के अनुसार, सीडब्ल्यूसी ने वंदे मातरम को लेकर उठाई गई आपत्तियों पर विचार किया और निष्कर्ष निकाला कि गीत के केवल पहले दो पदों को राष्ट्रगीत के रूप में सार्वजनिक अवसरों पर गाया जाना चाहिए।
प्रस्ताव में यह भी कहा गया था कि सार्वजनिक और राष्ट्रीय सभाओं में वंदे मातरम गाते समय रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा तैयार किए गए संस्करण और संगीत का अनुसरण किया जाए।
वंदे मातरम का ऐतिहासिक संदर्भ
बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 'वंदे मातरम' की रचना की थी। इसके बाद इसके अन्य पदों को उनके 1882 में प्रकाशित उपन्यास आनंदमठ में शामिल किया गया। 1896 में कांग्रेस के अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने वंदे मातरम गाया था।
वरिष्ठ लेखक और पत्रकार नीलांजन मुखोपाध्याय ने भी अपने लेख में 1937 के दौरान टैगोर की टिप्पणी का उल्लेख किया है। उनके अनुसार, टैगोर ने गीत के पहले दो पदों को अन्य पदों से अलग बताते हुए कहा था कि इन पदों की अपनी स्वतंत्र पहचान बन चुकी थी और उन्हें विभिन्न समुदायों द्वारा स्वीकार किया जा सकता था।
1939 में हरिजन में प्रकाशित एक लेख में महात्मा गांधी ने भी वंदे मातरम के पहले दो पदों को लेकर टैगोर के विचारों के समर्थन की बात कही थी।
राष्ट्रगीत और संवैधानिक संदर्भ
राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत से जुड़े संवैधानिक तथा कानूनी पहलुओं पर भी समय-समय पर चर्चा होती रही है। Prevention of Insults to National Honour Act, 1971 के तहत राष्ट्रीय सम्मान से जुड़े कुछ कृत्यों को दंडनीय बनाया गया है।
सुप्रीम कोर्ट के Bijoe Emmanuel vs State of Kerala मामले में धार्मिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े अधिकारों पर महत्वपूर्ण फैसला दिया गया था। मामले में तीन बच्चों ने राष्ट्रगान के दौरान सम्मानपूर्वक खड़े रहना स्वीकार किया था, लेकिन अपनी धार्मिक मान्यताओं के कारण राष्ट्रगान नहीं गाया था।
सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों के पक्ष में फैसला देते हुए कहा था कि सम्मानपूर्वक खड़े रहना राष्ट्रगान के प्रति सम्मान व्यक्त करने के लिए पर्याप्त हो सकता है और केवल राष्ट्रगान न गाने को अपने आप में उसका अनादर नहीं माना जा सकता, यदि व्यक्ति किसी प्रकार का व्यवधान उत्पन्न नहीं कर रहा हो।
संविधान सभा में राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत पर चर्चा
संविधान सभा में भी देश के राष्ट्रगान को लेकर चर्चा हुई थी। उस समय वंदे मातरम, सारे जहां से अच्छा और जन गण मन जैसे गीतों का उल्लेख किया गया था।
जस्टिस के. चंद्रु के अनुसार, संविधान के अंतिम रूप में राष्ट्रगीत को संवैधानिक ढांचे का अलग हिस्सा नहीं बनाया गया था। हालांकि, वंदे मातरम को स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान मिली ऐतिहासिक भूमिका और राष्ट्रीय महत्व के कारण विशेष स्थान प्राप्त हुआ।
वंदे मातरम पहली बार 1875 में साहित्यिक पत्रिका बंगदर्शन में प्रकाशित हुआ था और 1896 में कांग्रेस के अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे गाया था। ये घटनाएं बंगाल विभाजन से काफी पहले की हैं।
वर्तमान राजनीतिक बहस
वंदे मातरम के पहले दो पदों को लेकर कांग्रेस का फैसला राजनीतिक बहस का विषय बन गया है। कांग्रेस का तर्क है कि उसका निर्णय 1937 के ऐतिहासिक सीडब्ल्यूसी प्रस्ताव और उस समय के प्रमुख नेताओं के विचारों पर आधारित है। वहीं, इस मुद्दे पर अलग-अलग राजनीतिक दलों और नेताओं के विचार अलग-अलग हैं।
इस पूरे विवाद में वंदे मातरम के ऐतिहासिक महत्व, राष्ट्रीय आंदोलन में इसकी भूमिका, धार्मिक संवेदनशीलताओं और सार्वजनिक कार्यक्रमों में इसके उपयोग को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आए हैं।
इतिहासकारों और कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, वंदे मातरम से जुड़ी मौजूदा बहस को समझने के लिए इसके ऐतिहासिक संदर्भ और स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान लिए गए निर्णयों को ध्यान में रखना आवश्यक है।